शेष महेश दिनेश गणेश लौं - श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
15 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
श्री वृन्दावन के गोपेश्वर महादेव धन्य, धन्य हैं। उन्होंने वंशीवट पर अपनी बैठक बनाई है और वे वृन्दावन के कोतवाल (रक्षक) होने का अधिकार रखते हैं।
श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।
जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।
हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है।
न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ।
हे ब्रज की महारानी, श्री राधा! आपकी महिमा अपरम्पार है। आपकी दसियों के द्वार पर रिद्धि-सिद्धि बुहारी देती रहती हैं।
श्री राधा मेरी सुख साज हैं, श्री राधा ही सिरताज हैं, श्री राधा समस्त इष्टदेवों में रत्न हैं, और श्री राधा ही सर्वस्व हैं।
ब्रज की अधिष्ठात्री श्री राधिका महारानी हैं, जिनकी महिमा असीम और अपरंपार है। उनकी दासियों के द्वार पर भी रिद्धि और सिद्धि स्वयं उपस्थित होकर बुहारी-सेवा में तत्पर रहती हैं।
हे बरसानेवारी [राधिका], सुनो! श्री कृष्ण तुम्हारे ग़ुलाम हैं ! रिद्धि और सिद्धि नित्य आपके चरणों में निवास करती हैं। श्री कृष्ण सदैव आपके समीप विचरण करते हैं।
रिद्धि सिद्धि की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति तो अज्ञान ही है। सच्चा ज्ञान तो वही है जिससे श्यामा-श्याम के प्रेम की प्राप्ति हो।
गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।
कोटि-कोटि विष्णु लोक के निवासी श्री श्यामा जू की उपासना करते हैं, और देवी लक्ष्मी भी यह सोचकर श्री राधारानी की अर्चना में मग्न रहती हैं।
किसी को शेषनाग पर भरोसा है, कुछ को भगवान सूर्य पर भरोसा है। कुछ को भगवान शिव पर भरोसा है, जो वरदान देने के लिए प्रसिद्ध हैं।
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं की वृंदावन का नित्य विहार रस सर्वोपरि रस है और हर साधक इस रस का अधिकारी नहीं है।