15 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. धन धन वृन्दावन गोपेश्वर बाबा - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (07)

    श्री वृन्दावन के गोपेश्वर महादेव धन्य, धन्य हैं। उन्होंने वंशीवट पर अपनी बैठक बनाई है और वे वृन्दावन के कोतवाल (रक्षक) होने का अधिकार रखते हैं।

  2. जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।

  3. जाकी कृपा सों नित्य दिव्य ब्रजमंडल माँहि - श्री गिरिराज गोस्वामी 'अनन्त' (गोकुल)

    जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।

  4. कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

    हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है।

  5. चाहौं नहिं प्रसन्न कियो इन्द्र सुरराज जो है - श्री सुंदरी कुंवरी जी

    न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ।

  6. श्रीराधे सुख साज मेरे, राधे सिरताज मेरे - श्री लालदास (शुक सम्प्रदाय के रसिक संत)

    श्री राधा मेरी सुख साज हैं, श्री राधा ही सिरताज हैं, श्री राधा समस्त इष्टदेवों में रत्न हैं, और श्री राधा ही सर्वस्व हैं।

  7. वृज रानी श्री राधिके, महिमा अमित अपार - - ब्रज के दोहे

    ब्रज की अधिष्ठात्री श्री राधिका महारानी हैं, जिनकी महिमा असीम और अपरंपार है। उनकी दासियों के द्वार पर भी रिद्धि और सिद्धि स्वयं उपस्थित होकर बुहारी-सेवा में तत्पर रहती हैं।

  8. सुन बरसाने वारी गुलाम तेरो बनवारी - श्री मोहनलाल जी

    हे बरसानेवारी [राधिका], सुनो! श्री कृष्ण तुम्हारे ग़ुलाम हैं ! रिद्धि और सिद्धि नित्य आपके चरणों में निवास करती हैं। श्री कृष्ण सदैव आपके समीप विचरण करते हैं।

  9. रिद्धि मिले सिद्धि मिले मिले मोक्षधामा - श्री कृपालु जी महाराज, श्यामा श्याम गीत (10)

    रिद्धि सिद्धि की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति तो अज्ञान ही है। सच्चा ज्ञान तो वही है जिससे श्यामा-श्याम के प्रेम की प्राप्ति हो।

  10. श्री कृष्णदास अधिकारी जी की जीवनी

    गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।