समता वृन्दाविपिन की - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.70)
श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।
श्री अनन्य अली जी की वाणी श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के श्री अनन्य अली द्वारा लिखित ग्रंथ है।
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श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।
यद्यपि जीव आजीवन विविध साधनाओं में निरत रहे, तथापि विशुद्ध भजन का लेश मात्र भी प्राप्त करना दुष्कर है। परंतु श्री धाम वृन्दावन की महिमा अनिवर्चनीय है; यहाँ यदि कोई व्यक्ति स्वार्थवश भी विचरण करता है, तो भजन स्वयं उसे अंगीकार कर लेता है।
मान, अपमान और अहंकार को त्यागकर श्री धाम वृन्दावन में वास करो। वहाँ की परम मंगलकारी रज में रज बनकर रहो, तभी मन में दिव्य प्रेम का प्रकाश प्रकट होगा।
देह, मन, वाणी और दृढ़ आंतरिक निश्चय सहित श्रीधाम वृन्दावन में वास करो। दिन-रात केवल अनन्य प्रेमी रसिकों का ही संग होना चाहिए, तभी वह अति दुर्लभ रस जीव को प्राप्त हो सकता है।
जो व्यक्ति श्री वृन्दावन वास में बाधा उत्पन्न करे, उसे अपना परम शत्रु मानना चाहिए और उसका मुख भी नहीं निहारना चाहिए।
त्रैलोक्य के राजसुख, सम्पत्ति तथा पारिवारिक सुखों को त्यागकर उस श्रीवृन्दावन धाम में वास करना चाहिए, जो साक्षात् प्रेमरस का अथाह, अगाध समुद्र है।
श्री वृंदावन रस का यशोगान सुनकर के तुम भी हर्षित होकर गुणगान करो । यहाँ की रज में मगन होकर लोटो क्योंकि वृंदावन के रस के समान कोई अन्य रस कहीं नहीं है ।
कृपा की अथाह सागर, श्री राधा महारानी ही मेरी समस्त आशाओं को पूर्ण करने वाली हैं। एक उनके बल पर ही मैं सदा परम निश्चिंत अवस्था में रहता हूँ और श्री वृंदावन में वास करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूँ।
श्री प्रिया जी (श्री राधा) के चरणों से अंकित श्री धाम वृंदावन की भूमि परम रसाल है, जिसकी परम पावन रज का स्वयं रसिक शिरोमणि भगवान श्री कृष्ण भी वंदन करते हैं एवं उसमें लोटने से वे भी निहाल हो जाते हैं ।
वृंदावन की परम पावन भूमि पर, श्री राधा महारानी की शरण में पाँव पसार कर सोना भी अति श्रेष्ठ भजन है। अन्य स्थानों के कितने ही उत्तम भजन और साधन भी, इसके सम्मुख लज्जित होकर नतमस्तक हो जाते हैं।
हे दयालु श्री हरिवंश! मैं आपकी महिमा कहाँ तक कहूँ, क्योंकि आपके द्वार पर तो सहज ही लाड़िली लाल (श्री श्यामा-श्याम) सबको सुलभ हो जाते हैं।
हे श्री राधे, मेरी विनती सुनिए, आपकी कृपा के बिना, सबके लिए दुर्लभ, श्री व्यास नंदन (श्री हरिवंश जी) किसी को कैसे प्राप्त हो सकते हैं ?
चाहे विष खाना पड़े, आग में जलना पड़े, यमुना जी में डूब क्यों न जाना पड़े, परन्तु वृन्दावन मत छोड़ो ।