श्री भक्ति रसामृत-सिंधु

श्री भक्ति रसामृत-सिंधु संस्कृत में रचित भक्ति साहित्य का एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है जिसमें भक्ति-योग के पूर्ण विज्ञान का वर्णन है, जिसे श्रील रूप गोस्वामी जी ने लिखा है। श्रील रूप गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे अंतरंग शिष्य थे। श्री भक्ति रसामृत-सिन्धु में श्री राधा कृष्ण की विशुद्ध भक्ति, सेवा इत्यादि का विश्लेषण है। लेखक: श्री रूप गोस्वामी

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. तट-भुवि कृत-कान्तिः - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.243)

    यमुना के तट पर स्थित होने से ब्रज मंडल के वनों की शोभा और भी बढ़ जाती है, जहाँ भिनभिनाती मधुमक्षिकायें अनंत मधुरता से अलंकृत नव कदम्ब के वृक्षों का आश्रय लेती हैं जो मेरे मन में एक दिव्य भाव उत्पन्न करती है।

  2. अहो मधु-पुरी धन्या - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.237)

    ऐसा कौन सा बुद्धिमान व्यक्ति है जो ब्रज मंडल की शरण नहीं लेगा जिस धाम को वैकुंठ धाम से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है, जहां केवल एक दिन भी भाव से रहने से भगवान की भक्ति जागृत हो जाती है ।

  3. मथुरां च परित्यज्य - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)

    जो मूर्ख व्यक्ति मथुरा [ब्रज मंडल] को त्यागकर किसी अन्य स्थान से मोहित हो जाता है मानो वह मेरी माया से मोहित होकर जन्म-जन्मान्तर इसी संसार में भटकता रहता है।

  4. अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.235)

    अन्य स्थानों एवं धामों में मुक्ति ही सबसे बड़ा फल माना गया है जिसे वहाँ प्राप्त भी किया जा सकता है, परंतु भगवान की भक्ति, जो मुक्तों द्वारा भी वांछित है, उसे मथुरा [ब्रज] में प्राप्त किया जा सकता है।

  5. कदाहं यमुना-तीरे नामानि तव कीर्तयन् - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.156)

    हे कमल नेत्रों वाले भगवान कृष्ण, ऐसा कब होगा कि मैं वृंदावन में यमुना किनारे आपका कीर्तन गाते हुए आखों में आँसु भरकर नृत्य करूँगा?

  6. स्मेरां भङ्गी-त्रय-परिचितां - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.239)

    हे मेरे मित्र, यदि आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ ही सुख और चैन से रहना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण के उस रूप को कदापि न देखें जो वृंदावन में यमुना नदी के तट पर केशी घाट में विहार कर रहे हैं, जिनके होंठों पर हल्की मुस्कान है, जो त्रिभंगी हैं एवं जिनकी आँखें इधर उधर उन्मत्ता पूर्वक घूम रही हैं, जिनके होंठों पर बांसुरी है और जिन्होंने सिर पर मोर पँख धारण कर रखा है।

  7. श्री कृष्ण के चार अद्वितीय गुण - भक्ति रस्ममित्त सिंधु, रूप गोस्वामी

    असीमित गुणों से श्री कृष्ण के 64 प्रमुख गुण हैं। साठ गुण तो भगवान के अन्य रूपों में भी पाए जाते हैं। लेकिन चार गुण ऐसे हैं जो केवल श्री कृष्ण में ही पाए जाते हैं जो इस प्रकार हैं:

  8. भाव भक्ति के नौ लक्षण - रूप गोस्वामी

    श्री रूप गोस्वामी भाव भक्ति पर पहुंचे हुए जीवों के लक्षण बताए हैं। यह लक्षण हर उस जीव में पाए जाते हैं जो भाव भक्ति पर पहुंच जाता है, यह नौ प्रकार के लक्षण इस प्रकार हैं:

  9. श्री कृष्ण ब्रज से कहीं नहीं जाते हैं, तब प्रश्न है कि द्वारिका की लीला फिर कैसे हुई ?

    श्री कृष्ण, श्री राधा रानी के प्राणनाथ हैं, वे ब्रज से बाहर नहीं जाते हैं किन्तु इस रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं। हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि श्री कृष्ण ब्रज छोड़कर चले गए थे।