नेति नेति कहि ताहि वेदहू - श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
भक्ति सागर ग्रन्थ भक्ति का सागर है, जिसमें योग, आसन, सिद्धि, कृष्ण की दिव्य लीलाएं, उपनिषद आदि के श्लोक सम्मिलित हैं जिनका वर्णन श्री चरणदास जी ने किया है, जो ऋषि श्री शुकदेव जी के शिष्य हैं।
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वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
भक्ति-मार्ग के साधक की रहनी का वर्णन करते हुए श्री चरणदास जी कहते हैं कि यदि मुख से कुछ बोले, तो केवल श्रीहरि-कथा ही बोले; अन्यथा शांत रहकर मौन धारण करे। आवश्यकता पड़ने पर ही आवश्यक बात कहे, अन्यथा भूलकर भी कभी मिथ्या, कड़वे या दुर्वचन न बोले।
नन्दनन्दन, श्री कृष्ण के मुकुट की शोभा पर न्योछावर हूँ। समस्त सखियों के बीच श्री हरि इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, जैसे नक्षत्रों के मध्य चन्द्रमा विराजमान हों।
वनों में गह्वर वन, सरोवरों में प्रेम सरोवर, घाटों में श्री युगल-विहार घाट, गलियों में कुंज गलियाँ और पर्वतों में श्री गोवर्धन परम रमणीय हैं।
जैसे दूध का सार तत्व घी होता है, वैसे ही समस्त धामों में वृन्दावन परम श्रेष्ठ है। जैसे सम्पूर्ण देह का आधार प्राण है, वैसे ही सब धर्मों का सार, मूल और प्राण स्वरूप तत्त्व हरि-भक्ति ही है।
श्रीस्वामी हरिदास जी, हरिव्यास जी, श्रीकृष्णदास, एवं श्रीहित अलि (हरिवंश महाप्रभु) — ये सभी महान रसिक आचार्य हैं। इनके दिखाए हुए मार्ग में ही सुखों का सागर है।
श्रीधाम वृंदावन की यह भूमि स्वर्ण जैसी है, जिसने सतोगुण रूपी आभूषण धारण कर रखा है। श्री चरणदास बार बार बलिहारी जा रहे हैं, जिसे केवल दिव्य दृष्टि से ही निहारा जा सकता है।
दिव्य दंपति श्री राधिका-श्याम के नाम का भजन करो और उनके गुणों का गान करो। महाप्रसाद (जो युगल को अर्पित किया गया हो) के प्रति ऐसी अटल निष्ठा रखो कि उसके बिना कुछ भी न खाओ।
जो श्री बरसाना धाम में वास करते हैं उन्हें अपना निज बंधु जानना चाहिए। तुम्हारे किशोरीजी (श्री राधा) के नाते के कारण ही, उनसे नाता जोड़कर यथा शक्ति से उसे निभाना चाहिए ।
व्रजभूमि को ही निज अपनी भूमि मानो, और मंत्र "श्री राधे श्याम" का निरंतर जप करो । इसे परम पावन गायत्री मानो क्योंकि यह समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।
जिसमें प्रिया-प्रियतम को सुख मिलता है, केवल वही हमारा धर्म है। जिसमें उनकी अनन्यता भंग नहीं होती, वही हमारा कर्म है।
श्री वृंदावन धाम के रसिकों की गति का वर्णन करना सर्वथा असंभव है क्योंकि जिसकी जैसी दृष्टि होती है उसको वैसे ही दिखती है ।
युगल किशोर श्री श्यामाश्याम शास्त्रों में वर्णित पाँच देवों की उपासना से परे हैं। ये तो रसिकों के परम धन हैं, जो उनके ह्रदय में स्थित अति गोपनीय हैं।
जिनका ध्यान योगीजन सदा करते रहते हैं और जिनको पाने के लिए तपस्वी लोग अपने पूरे शरीर पर भस्म लगाकर कठोर तपस्या करते हैं।
श्री वृंदावन धाम में अखंड नित्य विहार परायण श्री बिहारी बिहारिनी अवतार लीला से परे हैं, जो सदा नित्य किशोर रहते हैं एवं विहार में ऐसे उन्मत्त हैं कि दिन और रात भी नहीं जानते ।
श्री वृंदावन धाम बीस कोस के फेरे में स्थित है जहां की मनमोहक कुंज गलियाँ वृक्षों एवं लताओं से सुसज्जित हैं।
हे गरीब निवाज़, मेरी लाज अब तुम्हारे हाथ ही है । तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मेरे बिगड़े काज़ को बना सकता है ?
जो श्वास नाम के बिना निकलती है, वह धिक्कार योग्य है, परंतु जिसकी प्रत्येक श्वास में नाम-स्मरण होता है, वही जीवन धन्य और सार्थक है।
उस दिव्य निज वृंदावन धाम का इन्हीं आँखों से अवलोकन किया है, जहाँ नित्य अखंड रास होता है। जहां पिय प्यारी नित्य विहार करते हैं, उसी दिव्य स्थल पर उनकी कृपा से यह दास भी पहुँच सका है।
हे नंद कुमार तुमसे बार बार यही विनती करता हूँ कि मुझे अब संसार से उबार कर अपने आश्रय में ले लीजिए।