बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।
श्री ब्रजवासी दास, श्री वृंदावन धाम के रसिक संत
21 लेख उपलब्ध हैं
श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।
श्री कृष्ण क्षण-क्षण में श्री राधा के श्री चरणों को अपने हाथों से स्पर्श कर रहे हैं, और क्षण-क्षण में उनकी बलैयां ले रहे हैं (न्योछावर हो रहे हैं)। वे बार-बार दीनतापूर्वक विनती करते हुए (हाहा खाते हुए) कह रहे हैं कि हे प्रियतमे! अब अपना यह मान त्याग दो।
नवल निकुंजों में नवीन-नागरी (श्री राधा) और नूतन-नागर नंदनन्दन (श्री कृष्ण) विराजमान हैं। आज प्रेम का सागर अपनी मर्यादाओं को त्यागकर उमड़ पड़ा है, जहाँ ये दोनों आनंद के साथ परस्पर मिल रहे हैं।
श्यामसुन्दर सदा केवल प्रेम के ही अधीन रहते हैं—यह सत्य तीनों लोकों में सुविख्यात है। सच्चे प्रेम के बिना नन्दमहाराज के पुत्र श्रीकृष्ण की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है।
प्रेम और सौंदर्य से परिपूर्ण, हृदय में आनन्द और उल्लास लिए, युगल माधुरी के रस से ओत-प्रोत दिव्य दंपति (श्री राधा-कृष्ण) ब्रज में मधुर विहार करते हैं।
श्री वृंदावन धाम सौंदर्य और माधुर्य की अद्भुत निधि है, जिसका वर्णन करने में वेद भी असमर्थ हैं, जहाँ रसिक नवल श्यामसुंदर नित्य विहार करते हैं।
ब्रज की समस्त गोपियों के हृदय में केवल एक ही भावना व्याप्त है - 'श्री कृष्ण और श्री राधा दोनों मिले रहें', और यही युगल स्वरूप रात-दिन उनके ध्यान का एकमात्र विषय बना रहे।
जब श्रीकृष्ण ने परम प्रीतिपूर्वक श्री राधा के चरणों का स्पर्श किया, तो उनका मान समाप्त हो गया, और वे प्रसन्नचित्त हो गईं जिससे दोनों के विरह-संताप का शमन हो गया ।
प्रेम में भरे, सुंदर छवि से भरे हुए, आनंद एवं उल्लास से भरे, युगल माधुरी के रस से भरे श्री श्यामा श्याम ब्रज में नित्य क्रीड़ा करते हैं।
साक्षात रस की ख़ान हैं, वृंदावन की दिव्य जोड़ी, श्री राधा कृष्ण, सदा नवीन दूल्हा एवं दुल्हन ही रहते हैं।
श्री वृंदावन धाम की महिमा अपरम्पार है जहां परब्रह्म भगवान श्री हरि नित्य विहार परायण हैं ।
हे सखी, अब ये नेत्र मेरे नहीं रहे; ये तो श्री श्यामसुंदर के अधिकार में चले गए हैं। इनमें उनका ही रूप-रस बस गया है और वे इन अँखियों में निरंतर निवास करते हैं।
मैंने लोक-लाज और कुल की मर्यादा को छोड़कर केवल उस श्यामसुन्दर से ही प्रेम किया है। प्रेम तो वास्तव में उसी से करना चाहिए, जिससे हमारी आत्मा की शाश्वत और वास्तविक पहचान है।
श्री वृन्दावन धाम सुख, रस एवं रूप की अपार निधि है, जिसकी महिमा का वर्णन सरस्वती, नारद, शेष, शिव एवं चारों वेद करते हैं।
हे प्रभु, मेरे हृदय की यही अभिलाषा है कि अब मुझे ब्रज का वास प्रदान करो, भले ही ब्रज की रेणु, तृण, वृक्ष, लता, पक्षी, पशु आदि किसी भी योनि में (जैसा आपको उचित लगे) रखो।
श्री वृन्दावन धाम की महिमा अत्यंत पवित्र और अलौकिक है; उसका यथार्थ वर्णन कोई भी कवि पूर्णतः नहीं कर सकता, क्योंकि वह मन, बुद्धि और वाणी की सीमा से परे है।
रसिक भक्त कवि श्री ब्रजवासीदास जी परम विरक्त एवं सांसारिक प्रचार-प्रपंच से सर्वदा दूर रहने वाले सिद्ध भक्त थे। निरन्तर श्रीराधा माधव का चिन्तन एवं उनका ही गुणानुवाद वर्णन इनका प्रमुख कार्य था।
सबसे पहले मैं संतों की मण्डली को सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ, क्योंकि उनकी कृपा के बिना भगवान हरि का यश-गान करना संभव ही नहीं है।
जहाँ स्वयं परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण गाय चराते हुए श्री वृन्दावन की भूमि पर अपने चरण रखते हैं, वे चरण भक्तों को असीम सुख प्रदान करने वाले हैं और ब्रजवासियों के समस्त दुखों का हरण करने वाले हैं।
श्री वृन्दावन धाम की शोभा और सुन्दरता का वर्णन भला ऐसा कौन है जो कर सके जब शेषनाग, महादेव, गणेश जी और ब्रह्मा जी भी उसकी महिमा का पार नहीं पा सकते।