श्री चरण दास (शुक संप्रदाय)
श्री चरण दास वृंदावन धाम के एक रसिक संत हैं जिन्होंने रसोपासना में शुक संप्रदाय की स्थापना की।
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कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास
श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।
लीला हैं अनन्त नाम रूप - श्री चरणदास, भक्ति सागर
जिनकी लीलाएँ, नाम, रूप और शक्तियाँ अनंत हैं तथा जिनका कोई पार नहीं पा सका है।
पतिवृता वृत जानिये वट बंशीबट - श्री चरणदास
भक्त को पतिव्रता स्त्री के समान अनन्य निष्ठा का व्रत धारण करना चाहिए, समस्त वट वृक्षों में केवल श्री वंशीवट को ही प्रधान जानना चाहिए और गोपेश्वर महादेव को अपना परम उपकारी मानना चाहिए, क्योंकि उनके समान हितकारी दूसरा कोई नहीं है।
नेति नेति कहि ताहि वेदहू - श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
जो बोले तो हरि-कथा नहीं - श्री चरणदास, भक्ति सागर
भक्ति-मार्ग के साधक की रहनी का वर्णन करते हुए श्री चरणदास जी कहते हैं कि यदि मुख से कुछ बोले, तो केवल श्रीहरि-कथा ही बोले; अन्यथा शांत रहकर मौन धारण करे। आवश्यकता पड़ने पर ही आवश्यक बात कहे, अन्यथा भूलकर भी कभी मिथ्या, कड़वे या दुर्वचन न बोले।
सेवाकुंज सो कुँज निज सम्पति दम्पति सेव - श्री चरणदास
यह सेवाकुंज ही हमारा परम निज-धाम कुंज है, जहाँ निरंतर श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करना ही हमारा परम लक्ष्य है। यह सेवा ‘तत्सुख-सुख’ के भाव से की जाती है—अर्थात् प्रिया-प्रियतम के सुख में ही अपना सुख मानना है। यही भाव अत्यंत उज्ज्वल और सर्वदा सरस है। हमारा गोत्र ‘अच्युत’ है—अर्थात् हमारा सर्वस्व श्रीकृष्ण से ही सम्बन्धित है।
मुकुट पर वारी रे नागरनन्दा - श्री चरणदास
नन्दनन्दन, श्री कृष्ण के मुकुट की शोभा पर न्योछावर हूँ। समस्त सखियों के बीच श्री हरि इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, जैसे नक्षत्रों के मध्य चन्द्रमा विराजमान हों।
जीवन मुक्तन को जहां है नाहीं अधिकार - श्री चरणदास
श्री चरणदास जी कहते हैं कि जहाँ उन महापुरुषों को भी प्रवेश का अधिकार नहीं है जो जीवन-मुक्त हैं, उस परम गोपनीय निकुंज धाम में श्री शुकदेव जी सखी स्वरूप धारण कर, श्री राधा-कृष्ण के उस 'नित्य विहार' रस का निरंतर अवलोकन करती रहती हैं।
बन गहबर सर प्रेमसर, घाट श्रीयुगल बिहार - श्री चरणदास
वनों में गह्वर वन, सरोवरों में प्रेम सरोवर, घाटों में श्री युगल-विहार घाट, गलियों में कुंज गलियाँ और पर्वतों में श्री गोवर्धन परम रमणीय हैं।
वृन्दावन सबसौं बड़ो यथा दूध में घीव - श्री चरणदास
जैसे दूध का सार तत्व घी होता है, वैसे ही समस्त धामों में वृन्दावन परम श्रेष्ठ है। जैसे सम्पूर्ण देह का आधार प्राण है, वैसे ही सब धर्मों का सार, मूल और प्राण स्वरूप तत्त्व हरि-भक्ति ही है।
श्री स्वामी हरिदास जी रसिक महा हरिव्यास - श्री चरण दास
श्रीस्वामी हरिदास जी, हरिव्यास जी, श्रीकृष्णदास, एवं श्रीहित अलि (हरिवंश महाप्रभु) — ये सभी महान रसिक आचार्य हैं। इनके दिखाए हुए मार्ग में ही सुखों का सागर है।
कंचन की यह भूमि है - श्री चरणदास, भक्ति सागर
श्रीधाम वृंदावन की यह भूमि स्वर्ण जैसी है, जिसने सतोगुण रूपी आभूषण धारण कर रखा है। श्री चरणदास बार बार बलिहारी जा रहे हैं, जिसे केवल दिव्य दृष्टि से ही निहारा जा सकता है।
आय सकत नहिं गिरा में संप्रदाय मम रीत - श्री चरण दास
मेरे संप्रदाय की रीति का पूर्ण वर्णन वाणी से कर पाना संभव नहीं। इसे प्रेम-सम्प्रदाय कहते हैं, इसकी कुछ अनुभूति और अभिव्यक्ति भी केवल प्रेम के माध्यम से ही संभव है।
राधा मोहन इष्ट निज मिष्ट न तिन सम और - श्री चरण दास
दिव्य युगल श्री राधा-मोहन मेरे प्रिय इष्ट हैं, उनसे अधिक मधुर और प्रिय कोई नहीं। वे समस्त अवतारों के मूल अवतारी हैं, सबके सिरमौर हैं।
धाम श्री वृन्दाविपिन हैं ग्राम श्री नंदग्राम - श्री चरण दास
श्री वृंदावन धाम, श्री नंदग्राम गाँव, और बरसाना पुर वे स्थान हैं जहाँ जीवों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
चिन्ता ही सूँ लगत है चरणदास उर आग - श्री चरण दास
यदि हृदय ही चिंता की अग्नि में जल रहा हो, तो, हे चरणदास, मन कैसे श्री हरि के कमल चरणों में लगा हुआ रह सकता है?
नाम राधिका श्याम भज राधावल्लभ गाय - श्री चरण दास
दिव्य दंपति श्री राधिका-श्याम के नाम का भजन करो और उनके गुणों का गान करो। महाप्रसाद (जो युगल को अर्पित किया गया हो) के प्रति ऐसी अटल निष्ठा रखो कि उसके बिना कुछ भी न खाओ।
श्री बरसाने जो बसत तिन्हें बंधु निज जान - श्री चरण दास
जो श्री बरसाना धाम में वास करते हैं उन्हें अपना निज बंधु जानना चाहिए। तुम्हारे किशोरीजी (श्री राधा) के नाते के कारण ही, उनसे नाता जोड़कर यथा शक्ति से उसे निभाना चाहिए ।
भूमि जानि व्रज भूमि निज मंत्र श्री राधे श्याम - श्री चरण दास
व्रजभूमि को ही निज अपनी भूमि मानो, और मंत्र "श्री राधे श्याम" का निरंतर जप करो । इसे परम पावन गायत्री मानो क्योंकि यह समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।
प्रिया प्रियतम जिमि सुख लहै - श्री चरण दास
जिसमें प्रिया-प्रियतम को सुख मिलता है, केवल वही हमारा धर्म है। जिसमें उनकी अनन्यता भंग नहीं होती, वही हमारा कर्म है।