ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)
आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
वृंदावन के रसिक श्री हठी जी द्वारा लिखित भक्ति सम्बंधित सवैया।
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आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
श्री राधिका रानी के गले में हीरों के मनमोहक हार सुशोभित हैं, तथा वे गजमुक्ताओं (श्रेष्ठ मोतियों) के अत्यंत सुखदायक गजरे धारण किए हुए हैं।
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।
हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।
हे श्री राधिके! आप व्यर्थ ही इतना हठ क्यों कर रही हैं? थोड़ा अपने प्रियतम के इन सुंदर वचनों को सुनिए, जो अमृत के समान मधुर हैं।
श्री वृषभानु-नंदिनी के चरण-कमल मक्खन और रेशम से भी अधिक कोमल हैं। वे कमल की कलियों से भी अधिक सुकुमार हैं।
रम्भा, लक्ष्मीजी, पार्वतीजी, विमला, नवला, और रति (कामदेव की पत्नी) सभी श्री राधा के रूप-सौंदर्य को निहारकर मानो छली हुई सी स्तब्ध खड़ी रह जाती हैं।
प्रेम में पूर्णतया आसक्त होकर श्री कृष्ण अपने हाथों से श्री राधा के चरण कमलों में जावक लगाते हैं। ब्रज की प्यारी ठकुरानी, श्री राधा के कमल जैसे चरणों को सुंदर बिछुओं से सुसज्जित करते हैं।
श्री राधा रानी ने आज स्वयं के लिए एक नवीन और अति सुन्दर रूप बनाया है। सिर पर मोर मुकुट और गले में गुंजा माला धारण की है। उनकी छवि बहुत प्यारी है।
श्री राधा के मुख-कमल की आभा चंद्र के समान है और उनके अंग का वर्ण स्वर्ण के समान है, जिनके दर्शन मात्र से मैं बिना किसी मोल के बिक गया हूँ।
श्री राधा मक्खन की तुलना में अधिक कोमल और गुलाब की पंखुड़ियों से अधिक मुलायम हैं। जैसा कि श्री हठी जी कहते हैं, उनकी सुंदरता कमल के फूल से भी अधिक है।
श्री राधा की कृपा से ही शुकदेव ज्ञानी हुए हैं और उन्हीं की कृपा से भगवान शिव भी समाधि को प्राप्त हुए हैं।