श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान

श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान, श्री भागवत रसिक देव जू की वाणी का चौथा अध्याय है । यह उन रसिक भक्तों के लिए है जो युगल सरकार श्री श्यामा श्याम की झांकी का ध्यान करना चाहते हैं। रचयिता : श्री भागवत रसिक देव जी

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. निसबासर तिथि मास रितु - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

    उत्सव त्यौहारों से संबंधित समस्त सांसारिक व्यवहारों को त्यागकर नित्य निकुंज मंदिर के दिन रात, तिथि मास ऋतु और समस्त उत्सवों को भाव में ही देखना चाहिए ।

  2. रजधानी वृन्दाबिपिन, वय किसोर जुगराज - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

    नित्य धाम श्री वृंदावन ही रसिकों एवं युगल किशोर (प्रिया प्रियतम) की राजधानी है, जहां लालितादिक सहचरियाँ रस विलास के नित्य नये साज सजाया करती हैं।

  3. आरोहन अवरोहनी करत रहैं दिन रैन - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (125)

    श्रीराधा-कृष्ण अहर्निश प्रेम के रसमय आरोहण-अवरोहण अर्थात प्रेम की गंभीर क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि उन अनन्य रसिकों के नेत्र धन्य हैं, जो इस रसमयी युगल छवि को छोड़कर अन्यत्र कहीं और दृष्टिपात भी नहीं करते।

  4. जन्म मरन माया नहीं, जहँ निसि दिवस न होइ - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (9)

    जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न माया का प्रभाव और न दिन-रात का क्रम; उस दिव्य वृंदावन धाम में अनुपम रूप वाले लाड़िली लाल सदा अपने सच्चिदानंद स्वरूप में एकरस नित्य विहार करते हैं।

  5. नवधा भक्ति निमित्त लै, जे सेबत अवतार - श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित्य बिहारी जुगल ध्यान (129)

    जो साधक मुक्ति, बैकुंठ‑प्राप्ति या किसी भी अन्य सिद्धि‑कामना को लक्ष्य बनाकर नवधा भक्ति का आश्रय लेते हैं और भगवान के अवतारों की उपासना करते हैं, वे इस विशुद्ध प्रेममयी रस‑उपासना के अधिकारी नहीं माने जाते।

  6. छके जुगल छवि वारूनी - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (124)

    प्रिया-प्रियतम की छवि-रूपी वारुणी का आस्वादन कर और प्रेम-रस के सर्प से डसे हुए सहचरियों के नयन ऐसे मतवाले हो गए हैं कि किसी गारुड़-मंत्र (जहर उतारने वाला मंत्र) का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

  7. गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7)

    गौर-श्याम स्वरूप वाले प्रिया-प्रियतम के श्रीअंगों की कांति अत्यंत सुन्दर, कोमल और अद्भुत है। यह दिव्य जोड़ी परस्पर अधरामृत-रस का पान करते हुए सतत सुख और शांति का अनुभव करती है। उसी रस से उनका तोषण और पोषण होता रहता है।

  8. तुष्ट पुष्ट तासौं रहैं - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (8)

    नित्य-विहार की इस दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) को न तो बुढ़ापा स्पर्श करता है और न ही कोई रोग। ये दोनों कभी बाल्य या यौवनावस्था का भोग नहीं करते; ये सदा नित्य-किशोर ही रहते हैं।

  9. निज मन में अनुभव भयौ - श्री भगवत रसिक जी, श्री नित बिहारी जुगल ध्यान (1)

    श्री ललिता सखी के महाप्रसाद स्वरूप इस नित्य-विहार का निज मन में ही अनुभव हुआ है; ऐसी अगोचर वस्तु का स्फुरण हुआ है जो नित्य, अनंत और अनादि है।

  10. जोगी ज्ञानी कर्मठी - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित बिहारी जुगल ध्यान (128)

    अनन्य रसिकों का मार्ग योगियों, ज्ञानियों, कर्मठों और तपस्वियों के मार्ग से अत्यन्त भिन्न और दूर होता है। अनन्य रसिकों के नयनों में तो नित्य ही भरपूर रूप से श्री राधा–कृष्ण समाए रहते हैं।

  11. रजधानी वृंदाविपिन - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

    वृन्दावन धाम नित्य-दम्पति श्री राधा–कृष्ण की राजधानी है, जहाँ सहचारियाँ उनकी ‘केलि-लीलाओं’ से सम्बन्धित विविध सेवाओं का संपादन करती रहती हैं।

  12. नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)

    वह (नित्य-विहार-रूपी अद्भुत वस्तु) न निर्गुण है, न सगुण; बल्कि दोनों से विलक्षण है। न वह पास है, न दूर—प्रेमियों के लिए वह सर्वत्र है, किंतु प्रेम-विहीन के लिए वह कहीं भी नहीं है। भगवत रसिकजी कहते हैं कि यही अद्भुत वस्तु रसिकजनों की प्राण-संजीवनी है।

  13. जुगल ध्यान सीखै सुनै - श्री भगवत रसिक देव जी की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (25)

    श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक श्रीयुगल के इस ध्यान को मन लगाकर सीखता, सुनता और समझता है, उसे नित्यरसिक (श्रीप्रिया-प्रियतम अथवा स्वामी श्री हरिदासजी) स्वयं अपने हृदय से लगा लेते हैं।

  14. नहीं तरे पाताल के - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)

    वह नित्य-विहार-रूपी तत्त्व न तो पाताल में है और न ही गोलोक में; अपितु वह इस विराट् ब्रह्माण्ड के हृदय-कमल—श्री वृन्दावन धाम—में अपना नित्य निवास बनाए हुए है।