श्री पुरूषोत्तम जी

श्री पुरूषोत्तम जी,ब्रज के रसिक कवि

11 लेख उपलब्ध हैं

  1. मृगनैनी नार नवल रसिया जाके - श्री पुरुषोत्तम जी

    मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है।

  2. प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

    नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।

  3. दरसन दै मोरमुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

    हे मोरमुकुट से शोभायमान श्री कृष्ण! कृपा करके मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए। आपकी कमर पर बँधी सुंदर काछनी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है और आपके पीतवर्ण वस्त्र मंद पवन में लहराकर अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं।

  4. दरसन दै निकसि अटा में ते - श्री पुरुषोत्तम जी

    जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]

  5. ब्रज की तोय लाज मुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

    हे गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण! ब्रज की लाज और प्रतिष्ठा तुम्हारे ही करकमलों में है।चंद्रमा और सूर्य भी तुम्हारे ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, और आकाश के नौ लाख तारे भी निरंतर तुम्हारे ही सौंदर्य को निहारते हैं।

  6. रास रच्यौ वृंदावन बनवारी - श्री पुरुषोत्तम जी

    वृंदावन में रसिक-बिहारी श्रीकृष्ण ने यमुना तट के वंशीवट कुंजों में रास रचा है । वे नृत्य करते हुए सखियों का मन हर रहे हैं और प्रेम के रंगों में सब को सराबोर कर रहे हैं।

  7. प्यारो प्यारी झूले क़दम की डारियां - श्री पुरुषोत्तम जी

    पिय-प्यारी (श्री राधा-कृष्ण) कदंब वृक्ष की डालियों पर एक संग झूला झूल रहे हैं। आकाश में बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है, और चारों ओर गोपियाँ हर्षित हो उठी हैं ।

  8. रस लै तो द्वार पर्‌यो रहियो - श्री पुरुषोत्तम जी

    यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है।