मृगनैनी नार नवल रसिया जाके - श्री पुरुषोत्तम जी
मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है।
श्री पुरूषोत्तम जी,ब्रज के रसिक कवि
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मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है।
नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।
हे मोरमुकुट से शोभायमान श्री कृष्ण! कृपा करके मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए। आपकी कमर पर बँधी सुंदर काछनी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है और आपके पीतवर्ण वस्त्र मंद पवन में लहराकर अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं।
जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]
हे गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण! ब्रज की लाज और प्रतिष्ठा तुम्हारे ही करकमलों में है।चंद्रमा और सूर्य भी तुम्हारे ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, और आकाश के नौ लाख तारे भी निरंतर तुम्हारे ही सौंदर्य को निहारते हैं।
वृंदावन में रसिक-बिहारी श्रीकृष्ण ने यमुना तट के वंशीवट कुंजों में रास रचा है । वे नृत्य करते हुए सखियों का मन हर रहे हैं और प्रेम के रंगों में सब को सराबोर कर रहे हैं।
पिय-प्यारी (श्री राधा-कृष्ण) कदंब वृक्ष की डालियों पर एक संग झूला झूल रहे हैं। आकाश में बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है, और चारों ओर गोपियाँ हर्षित हो उठी हैं ।
यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है।
एक गोपी प्रेमपूर्वक कहती है— हे श्यामसुंदर! थोड़ा और आगे आओ, मैं तुम्हें रंग लगाऊँ, तुम्हारे मस्तक और कपोलों पर गुलाल लगा दूँ।
हे रसिया श्री कृष्ण, मुझे ब्रज मण्डल दिखा दो। आपके ब्रज में बहुत से मोर हैं, जिनकी कूक से मेरा हृदय प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठता है।
वृंदावन में होली का ऐसा अद्भुत खेल रचाता है कि यहाँ की गोरी नारियों के हार टूट जाते हैं एवं साड़ियाँ फट जाती हैं ।