असाम्हो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने - श्रीमद भागवतम् (10.47.61)
उद्धव कहते हैं — यदि मैं वृन्दावन में किसी झाड़, लता अथवा औषधि के रूप में जन्म ले पाता, तो कितना सौभाग्यशाली होता, जिससे मैं इन गोपियों की चरण-रज का सेवन कर पाता।
श्रीमद्भागवत महापुराण हिंदू धर्म के 18 महा में से एक है। इसे श्री वेदव्यास जी जो भगवान के अवतार थे उन्होंने लिखा है। इसमें श्रीकृष्ण लीला, द्वैत, अद्वैत के रहस्य, एवं शुकदेव जी द्वारा परीक्षित को उपदेश है।
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उद्धव कहते हैं — यदि मैं वृन्दावन में किसी झाड़, लता अथवा औषधि के रूप में जन्म ले पाता, तो कितना सौभाग्यशाली होता, जिससे मैं इन गोपियों की चरण-रज का सेवन कर पाता।
मथुरा यदुवंश के राजाओं की राजधानी रही है। मथुरा का संबंध श्री कृष्ण से बहुत गहरा है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण यहाँ नित्य वास करते हैं ।
भगवान् (श्रीकपिलदेव) कहते हैं - ‘मेरे प्रेमी भक्त, मेरी सेवा को छोड़कर, सालोक्य, सार्ष्टि , सामीप्य, सारूप्य और एकत्व (भगवान् में मिल जाना -ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाना), ये (पाँच प्रकार की दुर्लभ मुक्तियाँ) दिये जाने पर भी नहीं लेते।
हे परीक्षित, जब बलराम एवं कृष्ण ने वृंदावन, गोवर्धन एवं यमुना को निहारा, तब उन दोनों का मन प्रेम से परिपूर्ण हो उठा।
सखि! सच पूछो तो, ब्रजभूमि ही परम पवित्र और घन्य है क्योंकि यहाँ यह पुरुषोत्तम मनुष्य के वेष में छिपकर रह रहे हैं। स्वयं देवादिदेव महादेव शंकर और श्री रमादेवी जिनके श्री चरणों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु यहाँ रंग-बिरंगे पुष्पों की माला धारण किये हुए भैया बलराम जी तथा गोपसखाओं के साथ मधुर वंशी बजाते और गऊओं को चराते हुए विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में मग्न होकर आनंद से विहार करते हैं। उनके श्री चरणों के स्पर्श से यह ब्रजभूमि धन्य एवं कृत कृत्य हो रही है।
हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी ब्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है।
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं कि ब्रज के किसी भी निवासी की चरण रज मिल जाए एवं ब्रज में किसी भी देह में जन्म मिल जाए, परंतु मेरे मस्तक पर नित्य ही ब्रज गोकुल के निवासियों की चरण रज रहे ।
नारद जी भक्त ध्रुव से कहते हैं: “यह वही मधुवन है, जहां प्रभु श्री कृष्ण ने लीलाएँ कीं, जो लीलाएँ उनकी सम्पन्न हो चुकी हैं, उनका ध्यान करना, यह स्थान श्री कृष्ण चिन्हों से अंकित है एवं पूजनीय है” ।
ब्रज का कण कण श्री कृष्ण चरणों से चिन्हित है, यह हमें नित्य ही श्री कृष्ण की याद दिलाता है । श्री कृष्ण को भला कोई ब्रज में कैसे भूल सकता है ?
श्री वृंदावन नाम का एक रमणीय वन है। यह स्थान बहुत उपयुक्त है क्योंकि यह गायों और अन्य पशुओं के लिए घास, पौधों और लताओं के साथ हरा-भरा है। इस वन मे सुंदर कुञ्जें और ऊंचे पहाड़ हैं और यह सभी गोप और गोपियों और गायों की सेवा के लिए सदैव से हरा-भरा है।
हे सखी, देवकी पुत्र कृष्ण के चरणकमलों का कोष पाकर वृन्दावन पृथ्वी की कीर्ति को फैला रहा है। जब मोर गोविन्द की वंशी सुनते हैं, तो वे मस्त होकर नाचने लगते हैं
यदि कोई कुत्ते का मास भी खाता हो और उसकी जिह्वा पर श्री हरि का नाम हो, तो वह चांडाल भी श्रेष्ठ है।
श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि जिसकी वाणी मेरी चर्चा से ही गदगद हो जाती है, जिसका चित्त द्रवित हो जाता है, जो बार-बार रोने लगता है, कभी हँसने लगता है, कभी लज्जा छोड़कर उच्च स्वर से गाने लगता है
जो मन्दिरों में भगवान के विग्रह का पूजन करता है, किन्तु यह नहीं जानता कि परमात्मा रूप में ईश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हैं, वह अज्ञानी हैं और उसकी तुलना उस व्यक्ति से कि जाती हैं, जो राख में आहुतियाँ डालता हैं|
अगर कोई उस स्थान को तुरंत नहीं छोड़ता जहां कोई भगवान या किसी भगवान के भक्त के प्रति अपमान सुनता है वह गिरता है और सभी भक्ति खो देता है
यदि कोई वेदों का सारा ज्ञान याद भी कर ले, लेकिन यदि वो अपना मन निरन्तर भगवान में ना लगा पाये, तो उसका ज्ञान उसके लिए उस बोझ की तरह है जैसे वो गाय को तो पाले परन्तु वो गाय दूध न देती हो
जो व्यक्ति राधा कृष्ण की नित्य भक्ति एवं सेवा करते हैं वो संसार की किसी भी परिस्थी से भयभीत नहीं होते।
एक गोपी अपनी मित्र से कहती है की मुझे आश्चर्य होता है कि इस मुरली ने कौन से ऐसे शुभ कर्म किए हैं कि श्री कृष्ण इनको नित्य ही अपने होठों से लगाए रखते हैं, और यह मुरली नित्य ही रस का पान करती रहती है।
वे ब्रज-स्त्रियाँ धन्य हैं, जो नित्य श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहती हैं, नित्य उन्ही का गान करती हैं, आँसु बहाती हैं, अनेक गतिविधियां करते हुए भी जैसे दूध निकालना, चारा खिलाना, दही मथना, बच्चों को पालना, पौधों पर पानी छिड़कना और झाड़ू लगाना इत्यादि करते हुए भी अपने मन को नित्य प्रभु में ही तल्लीन किये हैं।