श्रृंगार रस - तृतीय खंड [बयालीस लीला]
श्री राधा कृष्ण के श्रृंगार रस को समर्पित पदों एवं कवित्त को तीन भागों में बाँटा गया है जो श्री हित ध्रुवदास जी द्वारा लिखित 'बयालीस लीला' नामक ग्रंथ का भाग है।
12 लेख उपलब्ध हैं
या रस सौं जे रहे - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.53)
जो रसिक इस युगल-रस में सदैव रंगे रहते हैं, उनकी चरण-रज सदैव मस्तक पर धारण करनी चाहिये। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिन्होंने इस रहस्य को भली-भांति समझ लिया है, उन्होंने ही अपने इस मानव-शरीर को वास्तव में सफल किया है।
रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)
रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (21)
नवल छबि धाम युगल आज ऋतुराज वसन्त आगमन पर होली का शुभारम्भ करते हुए अनुराग की गुलाल उड़ा रहे हैं ।
सब तें कठिन उपासना प्रेमपंथ रस रीति - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.51)
प्रेम-मार्गीय रस-रीति की उपासना सब उपासनाओं से कठिन है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि राई के समान किंचित भी मन के विचलन से प्रेम प्रीति में अन्तराय पड़ जाता है।
ऐसी करौ नव लाल रंगीले जू - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.46)
हे नित्य नव रंग रंगीले लाल (श्री कृष्ण)! ऐसी कृपा करो कि मेरा यह चित्त आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं आकर्षित न हो।
प्यारी जू की भौंहनि की - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (30)
अरी सखि! हमारी प्रिया जी की स्वाभाविक बंक भृकुटियों के नर्तन ने सभी का मन तो मोहा ही है, अब तो मनमोहन श्रीकृष्ण का हृदय भी इस नर्तन की मरोड़ में बिंध गया है।
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.3)
आज सुकुमारी गौरांगी प्रिया एवं रसिक शेखर श्री बिहारी सरस विहार परायण हैं । उनकी वर्द्धमान् छबि वाणी - अगोचर है ।
प्रेम के खिलौना दोउ खेलत है प्रेम-खेल - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (40)
ये श्यामा-श्याम प्रेम के खिलौने हैं, जो निरंतर प्रेम-क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। सखियों ने इनकी प्रेम-क्रीड़ा के लिए उत्साहपूर्वक शय्या की रचना की है।
भाँति रँगीली छबीली के संग - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (4)
हे सखि ! अनुराग - रंजीता छबि आगरी प्रिया का सङ्ग प्राप्त कर आज छबीले लाल छबि - रत्नाकर बन गये हैं । अति सुन्दर सहाने तल्प पर वे तत्सुख रति - केलि परायण हैं ।
भाँति भली नवकुंज विराजत - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3.2
आज नव निभृत निकुञ्ज में, रसिक श्री राधिका एवं वल्लभ लाल अति सुन्दर छवि से भली भाँति विराजित हैं । प्रियतम ने नित्य विहारिणि प्रिया को अमूल्य निधि प्राणमणि की भाँति हृदय पर धारण कर रखा है ।
लाड़िली-लाल बिलास करैं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रंगार शत लीला (3.5)
श्री लाड़िली लाल जी सुन्दर सुहावनी रँगमगी शय्या पर विलास परायण हैं। अनुराग पूरित रसोन्मत्त युगल, मन्द मधुर हास परिहास करते हुए अपूर्व शोभा को प्राप्त हो रहे हैं।
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (12)
नवल रँगीले युगल, जो सदा रस में रँगे रहते हैं, आज प्रेम के सहज एवं नूतन रंग में अनुरक्त हैं।