रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)
रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]
श्री राधा कृष्ण के श्रृंगार रस को समर्पित पदों एवं कवित्त को तीन भागों में बाँटा गया है जो श्री हित ध्रुवदास जी द्वारा लिखित 'बयालीस लीला' नामक ग्रंथ का भाग है।
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रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]
नवल छबि धाम युगल आज ऋतुराज वसन्त आगमन पर होली का शुभारम्भ करते हुए अनुराग की गुलाल उड़ा रहे हैं ।
प्रेम-मार्गीय रस-रीति की उपासना सब उपासनाओं से कठिन है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि राई के समान किंचित भी मन के विचलन से प्रेम प्रीति में अन्तराय पड़ जाता है।
हे नित्य नव रंग रंगीले लाल (श्री कृष्ण)! ऐसी कृपा करो कि मेरा यह चित्त आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं आकर्षित न हो।
अरी सखि! हमारी प्रिया जी की स्वाभाविक बंक भृकुटियों के नर्तन ने सभी का मन तो मोहा ही है, अब तो मनमोहन श्रीकृष्ण का हृदय भी इस नर्तन की मरोड़ में बिंध गया है।
आज सुकुमारी गौरांगी प्रिया एवं रसिक शेखर श्री बिहारी सरस विहार परायण हैं । उनकी वर्द्धमान् छबि वाणी - अगोचर है ।
ये श्यामा-श्याम प्रेम के खिलौने हैं, जो निरंतर प्रेम-क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। सखियों ने इनकी प्रेम-क्रीड़ा के लिए उत्साहपूर्वक शय्या की रचना की है।
हे सखि ! अनुराग - रंजीता छबि आगरी प्रिया का सङ्ग प्राप्त कर आज छबीले लाल छबि - रत्नाकर बन गये हैं । अति सुन्दर सहाने तल्प पर वे तत्सुख रति - केलि परायण हैं ।
आज नव निभृत निकुञ्ज में, रसिक श्री राधिका एवं वल्लभ लाल अति सुन्दर छवि से भली भाँति विराजित हैं । प्रियतम ने नित्य विहारिणि प्रिया को अमूल्य निधि प्राणमणि की भाँति हृदय पर धारण कर रखा है ।
श्री लाड़िली लाल जी सुन्दर सुहावनी रँगमगी शय्या पर विलास परायण हैं। अनुराग पूरित रसोन्मत्त युगल, मन्द मधुर हास परिहास करते हुए अपूर्व शोभा को प्राप्त हो रहे हैं।
नवल रँगीले युगल, जो सदा रस में रँगे रहते हैं, आज प्रेम के सहज एवं नूतन रंग में अनुरक्त हैं।