सिद्धांत के पद [श्री रसिक देव जी की वाणी]

सिद्धांत के पद, ग्रंथ श्री रसिक देव जी की वाणी में श्री रसिक देव जू द्वारा लिखित सिद्धांत पदों का संकलन है। रचैयता: श्री रसिक देव जू

11 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (15)

    श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ।

  2. बनि दुकूल बैठे परजंक - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17)

    दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) रेशमी वस्त्रों से सुशोभित होकर साथ बैठे हैं। कमल-से नेत्रों से एक-दूजे को निहारते हैं और प्यारीजू (श्री राधा) अपने प्रियतम को प्रेम-सुख में भरकर आलिंगन करती हैं।

  3. होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (21)

    श्री श्यामसुंदर के संग होली खेलने के लिए उल्लास से भरी हुई छबीली श्याम प्यारी (श्री राधा) आयी हैं । अपने नेत्रों में अबीर एवं गुलाल रूपी प्रेम रंग भरकर, आज यह अपने मनभाया कर रही हैं ।

  4. हिंडोरे झूलत तन सुकुमार - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (23)

    सुकुमार शिरोमणि नित्यविहारी श्री युगल आनदोल्लास के हिंडोले पर झूल रहे हैं। श्री प्रियाजी पुलकित हो होकर अपने प्राणाधार प्रियतम के हृदय से लग रही हैं।

  5. तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (11)

    प्रिया प्रियतम एक दूसरे को निहार रहे हैं । इतने में श्री राधा मान कर लेती हैं । ऐसा सूक्ष्म मान हुआ है कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा, कटाक्ष में ही मान हो गया है । इतने में एक सखी श्री राधा से कहती है, हे राधे, तुम्हारा तो मान का स्वभाव ही है ।

  6. दूलह दुलहिन अधिक बनी - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (25)

    नित्य दूल्हा दुलहिन श्री राधा कृष्ण आज सम्पूर्ण श्रृंगार से सज्जित हैं । दोनों कल्पतरु वृक्ष की पूजा करने चले हैं, लेकिन आज यहाँ बात कुछ और है ।

  7. श्रीबिहारीजू खेलत बसंत - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

    श्रीबिहारी जी वसन्तका खेल-खेल रहे हैं । आनन्द से भरी सब सखियाँ भी वहाँ उपस्थित हैं और हैं श्री किशोरी जी जिनके प्रत्येक अंग में रूप खिला है ।

  8. सखी री मन के स्याम सुखदाई - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)

    हे सखी, मन में जो श्री नित्यबिहारी बिहारिनी जु निरंतर विहार कर रहे हैं, वे ही श्याम सदाकाल सुखदाई हैं । प्रकट श्याम से हर क्षण कैसे मिल सकते हैं और उनका वियोग भी दुःखदाई है ।

  9. स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)

    हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गले अर्थात् आपकी शरण में ही आ गया हूँ, मैं तो समस्त साधन और साध्य को त्याग कर, केवल आपकी ही शरण में आया हूँ,और मेरा जीवन आप से ही हैं, अब आपके मन में जैसा आये वैसा करो। मैंने नख से सिख तक दोषों से ही भरा होने के कारण इतनी अनीति की है जिसकी कोई सीमा नहीं है।

  10. स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी

    हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गरे ही पढ़ गया हूँ, मैं तो केवल आपकी ही शरण में आया हूँ, ओर मेरे जीवन के पल आपसे ही बीते हैं, अब आपके मन में जैसा आये वैसा करो। श्री रसिक देव जी कहते हैं की हे बिहारीजी आप अगाध करुणा के सागर हैं, मेरी यही आशा है की आप कुछ ढरोगे सो ढरोगे, मैं कोई योग्य नहीं हूँ ।

  11. भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ - श्री रसिक बिहारी देव, श्री रसिक बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (03)

    श्रीवृन्दावन अखंड वास करनेवाले निज आश्रित जनों से श्री रसिक देव कह रहे हैं "हे भाई! तुमको सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू का निज विलासरस महल श्रीवृन्दावन का अखंड वास प्राप्त हो गया है, यह तुम्हारा अहो भाग्य है।