यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि - श्री वल्लभाचार्य, चतुः श्लोकी (3)
हे मन, यदि तूने श्रीगोकुल के अधिपति श्री कृष्ण को सम्यक प्रकार से अपने हृदय में धारण कर लिया है, तो फिर लौकिक और वैदिक फलों की क्या आवश्यकता रह जाती है?
महाप्रभु वल्लभाचार्य (1479-1531 ईस्वी), जिन्हें वल्लभ के नाम से भी जाना जाता है, एक हिंदू भक्त, धर्मशास्त्री और दार्शनिक थे, जिन्होंने भारत के ब्रज क्षेत्र में राधा कृष्ण-केंद्रित पुष्टि मार्ग की स्थापना की।
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हे मन, यदि तूने श्रीगोकुल के अधिपति श्री कृष्ण को सम्यक प्रकार से अपने हृदय में धारण कर लिया है, तो फिर लौकिक और वैदिक फलों की क्या आवश्यकता रह जाती है?
जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान नहीं करेंगे।
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि की मध्य रात्रि में श्री कृष्ण मेरे सामने प्रकट हुए । अब मैं उन वचनों को प्रकट करूँगा जो उन्होंने कहा था ।
ऐसा महसूस करना चाहिए कि श्री कृष्ण हर जगह व्याप्त हैं एवं वे सभी की आत्मा हैं और निरंतर चिंतन करना चाहिए कि "मैं श्री कृष्ण की शरण में हूँ"। यह मेरा दृढ़ मत है।
हे अन्तः करण! मेरे वाक्य को सावधान होकर सुनो - वास्तव में श्रीकृष्ण से बढ़कर कोई और दोषरहित देवता नहीं है ।
यदि तुम श्री कृष्ण से विमुख हो जाओगे तो कालिकाल के प्रभाव में रहने वाले तुम्हारा तन और मन समय के प्रवाह से तुम्हारा नाश कर देंगे ऐसा मेरा विश्वास है । श्री कृष्ण सांसारिक नहीं हैं और न ही वे सांसारिक लोगों की पूजा को स्वीकार करते हैं ।
भगवान कृष्ण मुझे वह रस कब देंगे जो गोकुल की गोपियों और ब्रज के समस्त वासियों को मिला था ?
जो जीव भक्ति भाव से श्री कृष्ण का चिंतन करता है वो अपने आनंद के समुद्र में रहता है। जो जीव सांसारिक लक्ष्य से कृष्ण की पूजा करते हैं, उन्हें हमेशा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
अब मैं भक्ति की वृद्धि करने का उपाय बताता हूँ। जब भक्ति का बीज दृढ़ हो जाता है तो उस भक्ति को सांसारिक आसक्ति के त्याग से, कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से बढ़ाया जा सकता है ।
गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए । परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री हरि की इच्छा अनुसार ही चलना चाहिए एवं मन से सेवा करनी चाहिए और सुख में रहना चाहिए ।
सब कुछ भगवान कृष्ण से ही सम्बंधित है और उनसे कुछ भी अलग नहीं है। इसलिए, यदि आप ऐसी गतिविधियों (या कार्यों) में संलग्न हैं जो आपको लगता है कि उनसे संबंधित नहीं हैं, तो चिंता करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे वास्तव में उन्हीं से सम्बंधित हैं।
हे अंतःकरण मेरी बात सावधानी पूर्वक सुन, वस्तुतः दोष रहित श्री कृष्ण से कोई अन्य देवता नहीं है ।
समस्त श्रोताओं में सर्वश्रेष्ठ वह है जिसका मन और हृदय सम्पूर्ण प्रकार से श्रीकृष्ण के प्रेममयी रस में डूबा हुआ है। वह केवल दिव्य प्रेम को स्वीकार करता है और उसे किसी भी सांसारिक या वैदिक सुखों का कोई स्वाद नहीं है।
हे प्रभु ! कलियुग में सर्व मार्ग नष्ट हो चुके हैं और दुष्ट लोग धर्माधिकारी बन गए हैं, संसार में पाखंड ही पाखंड है, इसलिए हे भगवान श्रीकृष्ण, केवल आप ही मेरे आश्रय हो ।
ब्रजेश्वर श्री कृष्ण को सर्व भाव से सर्वदा भजन करना चाहिए । यह ही तुम्हारा एकमात्र धर्म है । इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा धर्म नहीं है ।
यदि किसी कारण आपके चित्त में द्वेग उत्पन्न हो रहा है तो ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो भी करेंगे वह अच्छा ही करेंगे, यह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें ।
मैं श्री यमुना जी को प्रणाम करता हूँ जो समस्त सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं । श्री यमुना जी के छोर की रज श्री कृष्ण के चरण कमल के समान चमक रही है । श्री यमुनाजी के तट पर स्थित कुंजों के फूलों की सुगंध से यमुना जी का पानी भी सुगंधित है। समस्त विनम्र एवं चतुर गोपियां यमुना जी की भक्ति करती हैं । श्री यमुना जी श्री कृष्ण की सुंदरता अपने में समेटे हुए है ।
श्री हरि के चरणों में प्रणाम करता हूँ एवं अब मैं अपने सिद्धांत को बताता हूँ । हर क्षण एवं हार कार्य करते हुए श्री कृष्ण की सेवा करो । सबसे उच्च कोटि की सेवा मानसी [मन से] सेवा है ।
(हे कृष्ण!) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी आंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के इष्ट हैं श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।
श्री राधा श्री कृष्ण प्रेममयी हैं, एवं श्री राधा प्रेममय श्री कृष्ण हैं । मेरे जीवन का सम्पूर्ण नित्य धन एवं गति युगल सरकार श्री राधा कृष्ण हैं ।