विलाप कुसुमांजलि

विलाप कुसुमांजलि को श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्री रघुनाथ दास गोस्वामी ने लिखा है। लेखक: श्री रघुनाथ दास गोस्वामी

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. त्वदलोकन-कालाहि - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (9)

    हे क्रीड़ा परायण स्वामिनी श्री राधे!, आपके दर्शन के अभाव में मैं काले सर्प के डंक से क्षण क्षण मरी जा रही हूँ। कृपया अपने श्री चरण कमल में संलग्न अलतारूप (महावर) औषधि देकर मुझे जीवन प्रदान करो।

  2. यदा तव सरोवरं सरस-भृंगसंघोल्लसत् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (15)

    हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है, तब से आपके श्रीचरणों के दास्यरस में मेरी लालसा जाग उठी है ।

  3. लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (101)

    हे स्वामिनी, लक्ष्मी देवी भी आपके चरणारविन्द के नखाग्र प्रान्त के सौन्दर्य का एक बिन्दु मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप मुझे अपने रूप-लीलादि के दर्शन योग्य नेत्र नहीं प्रदान करेंगी तो दावाग्नि के समान दुखदायी मेरे इस जीवन का क्या प्रयोजन है?

  4. पादाब्जयोस्तव विना वर - दास्यमेव - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (16)

    हे दिव्य-क्रीड़ा परायणा स्वामिनि ! आपके चरण-कमलों के सर्वश्रेष्ठ दास्य को छोड़कर मैं कभी भी अन्य किसी (सख्यादि) भाव की प्रार्थना नहीं करती हूँ। आपके सखीत्व को मैं नित्य बार-बार नमस्कार करती हूँ। आपके दास्य में ही मेरा अनुराग हो, यह मैं सत्य कह रही हूँ।

  5. यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (42)

    हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ जाता है। खञ्जन के नेत्रों को भी पराभूत करने वाले आपके इन नेत्रों की, मैं कभी आदर सहित काजल लगा कर पूजा कर सकूँगी?

  6. देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (8)

    हे देवि श्रीराधिके ! मैं दुःखसमूहरूप दुष्पार सागर में निराश्रय अवस्था में अति दुर्गति को प्राप्त कर रही हूँ। आप अपनी कृपारूप दृढ़ नौका में चढ़ाकर अपने अद्भुत चरणकमल-भवन में मुझे ले जाइये।

  7. हे श्रीसरोवर सदा त्वयि - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (98)

    हे श्रीराधाकुण्ड मेरी स्वामिनी श्रीराधा जी अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के साथ आपके तटवर्ती कुञ्ज में प्रेमोद्रेक में विविध क्रीड़ाएं करती रहती हैं। हे राधाकुण्ड ! आप उन युगलकिशोर के प्रिय से भी अधिक प्रियतम हैं। अतएव कृपा करके मेरी जीवनस्वरूपा स्वामिनी श्रीराधा के आज ही दर्शन करा दो ।

  8. स्वप्नेऽपि किं सुमुखि ते चरणाम्बुजात - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (11)

    हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्थक कर पाऊँगी।

  9. जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80)

    हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?

  10. आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (102)

    हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप मुझ पर मुझ कृपा नहीं करती हैं, तो फिर जीवित रहने का, व्रज में वास करने का यहां तक कि श्रीकृष्ण से ही मेरा क्या प्रयोजन है ?

  11. स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (93)

    हे करुणामयि देवी श्री राधे ! चारों ओर देखते हुए अवसर पाकर कदा आप स्नेह पूर्वक अपने मुख का चर्वित पान मेरे मुख में ही प्रदान करोगी?

  12. हा नाथ गोकुलसुधाकर सुप्रसन्न - श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)

    हे नाथ ! हे गोकुलचन्द्र ! हे प्रसन्नमुखकमल ! हे मधुर-मन्द मुसकानकारी ! हे कृपाभिषिक्त ! आप जहां अतिशय प्रेमपूर्ण होकर अपनी प्रिया श्रीराधा जी के साथ विहार करते हैं, अपनी प्रियतमा की सेवा के लिये मुझे भी आप वहां ले चलो ।