कब रसिकनिके पैर परि रोऊँ - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (04)
वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?
