6808 लेख उपलब्ध हैं

  1. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  2. स्वामी श्री हरिदास जू बीठल - श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    स्वामी श्री हरिदास जी, श्री विट्ठल विपुल जी, श्री विनोद जी, दासी श्री बिहारिनिदास जी तथा श्री व्यास जी की पावन रज प्राप्त करके परम आनंद पाया है। इन महान रसिक आचार्यों के चरणों की रज का आश्रय ही समस्त दिव्य सुख और उल्लास को प्रदान करने वाला है।

  3. श्रीललिता-पद भजन दुहेलो बिना - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (33)

    श्री ललिता जी के चरणों की कृपा से प्राप्त होने वाले श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार रस का भजन अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। श्री राधारानी की अकारण करुणा के बिना इस अनुपम और निर्मल प्रेमरस का स्पर्श भला कोई कैसे कर सकता है?

  4. अजापुत्र मैं मैं कहत दिये आपने प्रान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (100)

    बकरी का बच्चा 'मैं-मैं' (अहंकार) की पुकार करते हुए अपने प्राण गंवा देता है, जबकि उससे कहीं भली मैना है जो प्रभु का नाम लेकर आनंद से मलीदा खाती है। भाव यह है कि 'मैं-मैं' अर्थात् अहंकार जीव का विनाश कर देता है, जबकि प्रभु का नाम सुमिरन करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है।

  5. राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)

    हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?

  6. वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी

    श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।

  7. आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

    हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।

  8. ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)

    अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।

  9. जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

    सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं।

  10. देवतायतनानि कम्पन्ते राधाया - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (03)

    श्री राधिका की कृपा के लवलेश मात्र से देवता आनन्दित हो-होकर हँसते और नृत्य करते हैं और उनकी भृकुटी के नेक ही वक्र होने पर थर-थर काँपते हैं। अतः हम श्रुतियाँ भी सकल दोष-परिहार के लिए भूर्भुवः स्वः आदि व्याहृतियों के साथ स्तवन करती हुई उन्हें सदा अनुकूल करने के लिए वन्दना करती हैं।

  11. सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम

    हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।

  12. कर लकुटी मुरली गहैं घूँघर वारे केश - ब्रज के दोहे

    हाथों में लाठी और मुरली धारण किए हुए तथा सिर पर घुँघराले बालों से सुशोभित, श्यामसुंदर का यह अत्यंत सुंदर और मनमोहक स्वरूप मेरे हृदय में सदैव बसा रहे।

  13. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  14. श्रुति पुरान आगम स्‍मृति प्रेम सबहि को सार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (10)

    वेद, पुराण, आगम और स्मृतियाँ, इन सभी का परम सार प्रेम ही है। प्रेम के बिना हृदय में दिव्य प्रेम का बीज अंकुरित नहीं होता, अर्थात् दिव्य प्रेम की प्राप्ति अंततः प्रेम के द्वारा ही होती है।

  15. तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

    हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?

  16. अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

    जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।

  17. श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।

  18. सहज स्वाँस तीरथ बहै सहजो - श्री सहजो बाई

    सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।

  19. मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

    श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।