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  1. दियौ किसोरी लाड़ली श्रीवृंदावन - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, पक्षी बंध सवैया (6)

    हे सुख की सागर, श्री लाड़िली किशोरी जी (श्री राधा)! जैसे आपने अपनी अगाध कृपा करके मुझे श्री धाम वृन्दावन में वास प्रदान किया है, वैसे ही समस्त ब्रजवासी जन भी मुझ पर अपनी सहज कृपा-दृष्टि बनाए रखें एवं मेरा किसी ब्रजवासी के प्रति स्वप्न में भी अपराध न बने।

  2. कृपा करि मोहि सुदृष्टि निहारो - श्री संकेत अली, संकेत लता (861)

    हे स्वामिनी जू (श्री राधा)! कृपा करके अपनी मंगलमयी कृपा-दृष्टि से मेरी ओर निहारिए। ही सर्वज्ञ, परम सुजान एवं सर्व-शिरोमणि! मेरी अज्ञानता और मूर्खता को दूर कर दीजिए।

  3. साकत बाँभन जिन मिलौ वैष्णव - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)

    प्रभु-विमुख (विषयी) ब्राह्मण का संग कदापि नहीं करना चाहिए, उसकी अपेक्षा हरि-भक्त (वैष्णव) चंडाल का संग भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जिसके मिलने से हृदय में परम सुख और आनंद प्राप्त हो, मानो स्वयं श्री गोपाल ही मिल गए हों।

  4. विहारिणि तुमरोही विस्तार रहत - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।

  5. द्वै द्वै बाँह सिलह सजैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (643)

    जैसे जगत में साधारनतया दोनों हाथों में ही हथियार को सजाया जाता है, वैसे ही साधक समाज नाना प्रकार के साधन-बल का भरोसा अपने मन में रखते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मेरे तो एक ही हाथ स्वरूप नित्यबिहार का ही अनन्य भाव से भजन, नित्य-विहार की ही लालसा सदा-सर्वदा बनी है।

  6. किरीटकेयूरधरे नूपुराभातपादुके - सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (5)

    हे मुकुट और केयूर धारण करने वाली! जिनके चरण नूपुरों की शोभा से सुशोभित हैं, तथा जो अनेक दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर कृपा कीजिए।

  7. जासौं सपरस चाहिए तासौ अपरस - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)

    जिन रसिकों एवं महापुरुषों का हमें नित्य संग करना चाहिए, उनसे तो लोग प्राय: सदा दूर रहते हैं और जिन सांसारिक वासनाओं से युक्त लोगों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुंबक की तरह मन चिपका रहता है।

  8. ब्रज बीथिन्ह जब सांवरो चलै - ब्रज के दोहे

    जब साँवले श्रीकृष्ण ब्रज की गलियों में मदमस्त हाथी की भाँति अत्यंत सुंदर-मतवारी चाल से चलते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके संग-संग प्रतिपल अद्भुत सौंदर्य की वर्षा हो रही हो।

  9. श्री राधा बृजराज को नित - श्री मलूक दास जी की वाणी, श्रीराधाकृष्ण व्याहुला (2)

    हमें प्रतिदिन निरंतर श्री राधा जी और ब्रजराज श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से यह वर्णन किया है कि उनके संत ही उनका वास्तविक स्वरूप हैं।

  10. ओर मिले वन ना मिले - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)

    जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।

  11. ऐसौ अद्भुत प्रेम है दम्पति - श्री सरस माधुरी

    दिव्य दम्पति के अंगों में परस्पर ऐसा अद्भुत और विलक्षण प्रेम व्याप्त है कि वे नित्य निरंतर सर्वदा एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं, फिर भी उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती है।

  12. झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

    श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं।

  13. रस मैं मगन बिहारिनी दिय - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रस मंजरी (2)

    परम रस में निमग्न श्री विहारिणीजी (श्री राधा) ने अपने प्रियतम श्री कृष्ण के गले में अपनी भुजा डाली हुई है। इस अत्यंत सुंदर और सलोनी शय्या पर विराजमान यह युगल समस्त सौंदर्य की चरम सीमा प्रतीत हो रहा है।

  14. किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)

    हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।