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  1. जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

    सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं।

  2. देवतायतनानि कम्पन्ते राधाया - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (03)

    श्री राधिका की कृपा के लवलेश मात्र से देवता आनन्दित हो-होकर हँसते और नृत्य करते हैं और उनकी भृकुटी के नेक ही वक्र होने पर थर-थर काँपते हैं। अतः हम श्रुतियाँ भी सकल दोष-परिहार के लिए भूर्भुवः स्वः आदि व्याहृतियों के साथ स्तवन करती हुई उन्हें सदा अनुकूल करने के लिए वन्दना करती हैं।

  3. सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम

    हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।

  4. कर लकुटी मुरली गहैं घूँघर वारे केश - ब्रज के दोहे

    हाथों में लाठी और मुरली धारण किए हुए तथा सिर पर घुँघराले बालों से सुशोभित, श्यामसुंदर का यह अत्यंत सुंदर और मनमोहक स्वरूप मेरे हृदय में सदैव बसा रहे।

  5. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  6. श्रुति पुरान आगम स्‍मृति प्रेम सबहि को सार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (10)

    वेद, पुराण, आगम और स्मृतियाँ, इन सभी का परम सार प्रेम ही है। प्रेम के बिना हृदय में दिव्य प्रेम का बीज अंकुरित नहीं होता, अर्थात् दिव्य प्रेम की प्राप्ति अंततः प्रेम के द्वारा ही होती है।

  7. तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

    हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?

  8. अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

    जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।

  9. श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।

  10. सहज स्वाँस तीरथ बहै सहजो - श्री सहजो बाई

    सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।

  11. मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

    श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।

  12. करौ कृपा नव नागरी अद्भुत - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)

    हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।

  13. जगत भगत सबहीं हँसो बुरौ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)

    चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मिलकर मेरी हँसी उड़ाएँ, मैं किसी की बात का तनिक भी बुरा नहीं मानूँगा। श्रीराधा के प्राणप्रिय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अब जीवन में जो भी होनी हो, वह भले ही हो जाए।

  14. सुखनिधि सुन्दरि सरसनी सुनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (92)

    हे सुख-समुद्र-रूपा सुन्दरीजू, हे स्वामिनीजू, मेरी बात सुनिये! आप ही रस को उद्दीप्त करने वाली हैं। हे श्रीराधा गोरीजू, हे प्रियाजू, आपकी सदा जय हो। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी दासी बनी रहूँ।

  15. व्यास विझूका खेतकौ दुःख न काहू देइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (146)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जैसे खेत में खड़ा बिजूका (पुतला) देखने में भय उत्पन्न करता है, पर वास्तव में वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वैसे ही संसार के भय और बाधाएँ भी केवल भयभीत करती हैं। जो साधक प्रभु पर भरोसा रखकर, सब प्रकार की भय-बाधायों से निःशंक होकर आगे बढ़ता है, वह भक्ति और प्रेम-रस की अपार संपदा प्राप्त करता है।

  16. हरिजन रोइ रोइ सुख पावें - श्री हित रूप लाल

    श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं।

  17. पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

    प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।

  18. आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

    सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं।

  19. आह्लादिनीत्वात् राधैव रसं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (8)

    भगवान और भक्त दोनों को आनन्द प्रदान करने वाली आह्लादिनी होने के कारण, श्रीराधा ही सदा रस की वृद्धि करती हैं। मत्स्य एवं कच्छप आदि अवतारों के समय में रस की वार्ता भी दुर्लभ थी।