21 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. वंशीवट यमुना-निकट जहाँ सघन घन छाँह - ब्रज के दोहे

    श्री ललिता सखी कहती हैं — यमुना के सुरम्य तट पर स्थित वंशीवट पर, जहाँ सघन वृक्षों की छाया है, वहाँ श्रीराधा अपने मुख पर मधुर मुस्कान लिए खड़ी हैं, और प्रियतम श्रीकृष्ण ने उनके गले में अपनी बाँह डाल रखी है।

  2. या वृंदावन की बानिक याही पै बनि आवै - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (112)

    श्री वृंदावन धाम की समानता केवल वृंदावन धाम ही कर सकता है जहां यमुना का मनोहर पुलिन है, जहां सुंदर वंशीवट है जहां श्री कृष्ण ने मुरली बजाई थी ।

  3. श्री ललितलड़ैती जी की जीवनी 

    श्री ललितलड़ैती जी उन महात्माओं की परम्परा में आते हैं, जिन्होंने रासमंच के लिये लीलाओं को लिख कर रासानुकरण की विधा को समृद्ध किया है। इनका 'दम्पतिविलास' लीला-साहित्य की दृष्टि से एक ऐसा कोश-ग्रन्थ है, जिसमें लीला-सामग्री अपने फुटकर एवं संग्रथित - दोनों रूपों में विद्यमान है।

  4. जो हो कृपा बिहारिन की तो, वृन्दावन रस चाखै - लक्षदासजी महाराज

    जिसपर नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधारानी की कृपा होती है, वही श्री वृन्दावन के दिव्य रस का आस्वादन कर पाता है। वह यमुना तट एवं बंशीवट में वास करता है और नित्य श्री राधा कृष्ण का गुणगान करता है।

  5. श्री माधुरीदास जी की जीवनी

    माधुरीदास जी माधुरी कुण्ड के निवासी थे। गान-कला में कुशल थे। गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के उपासक थे। उज्वल रस के में इनकी प्रीति थी, प्रेमा-भक्ति इनका मार्ग था। अष्टयाम भावना में सदैव तल्लीन रहते थे।

  6. ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (7)

    हे सखी, मैं ब्रज की रज क्यूँ न बन गयी? यदि मैं ब्रज की रज होती तो गोकुल की डगर में पड़ी रहती और उड़ उड़ कर श्री श्याम सुंदर के शरीर से जा लगी रहती ।

  7. हा हा देर करो न किशोरी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (7)

    श्री ललित लड़ैती जी कह रहे हैं "हे किशोरी श्री राधा जू, अब देर न कीजिए, मुझे अपने निज महल श्री वृन्दावन की कुञ्ज-निकुंजों का वास एवं महल टहल प्रदान कीजिये।"

  8. वंशीवट के निकट हरि रास रच्यौ - श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (255)

    वंशीवट के निकट श्री हरि ने मोर मुकुट एवं पीले वस्त्रों को धारण कर रास रचाया। पुनः श्री यमुना जी के सुंदर तट पर, वृंदावन की सघन कुंजों में युगल वर श्री प्रियतम प्यारी आलस में भर उनींदे हो जाते हैं । श्री हरिराम व्यास इस अद्भुत छवि को निहार कर अति संतुष्टता एवं प्रसन्नता में भर कर श्री राधा कृष्ण पर बलिहार जा रहे हैं।

  9. मैं ब्रजवासिन की बलिहारी - श्री सूरदास, सूरसागर, उद्धव संदेश (146)

    श्री सूरदास जी कहते हैं कि मैं ब्रज वासियों की बलिहारी जाता हूँ जिनके संग श्री गोवर्धन धारी कृष्ण नित्य ही क्रीड़ा करते हैं। किसी बृजवासी के संग वह माखन चोरी की लीला करते हैं और किसी बृजवासी के संग वह दानलीला करते हैं।

  10. स्यामा स्याम वलैया लैहौं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (453)

    श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं की स्वयं को न्यौछावर करते हुए श्री वृन्दावन धाम का वास करुँगा। परम पवित्र श्रीयमुना जी में स्नान करुँगा और ब्रजवासीयों की जूठन को प्रशाद रूप में ग्रहण करुँगा। बंसीवट के परम रमणिक भूमी में भ्रमण करुँगा और लताओं के सुन्दर कुंजों का त्याग कर कहीं और नहीं जाउँगा। जब भी श्री राधा मान लीला करेंगी तो मैं उन्हें बड़े प्रेम पूर्वक मनाउँगा।

  11. हरि रसना राधा-राधा रट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (21)

    श्रीहरि की रसना राधा-राधा रट रही है। वे यद्यपि नागर और नट कहलाते हैं फिर भी और प्रिया से मिलने के लिये सदैव अधीर और आतुर बने रहते हैं।

  12. वृन्दावन धाम नीकौ - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृंदावन धाम का क्षेत्र अति ही सुखद है और वहाँ समय व्यतीत करना आनंदमय है। दिव्य युगल श्री श्यामाजू और श्री श्यामजी के अद्भुत नाम अति ही आकर्षक हैं और सभी मंदिरों में आनंद प्रदान करते हैं।

  13. संतो, सेव्य हमारे श्रीपिय प्यारे - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (5)

    हमारा सेव्य तत्व सदा ही एक मात्र वृन्दावन धाम है, जहाँ श्री युगल वर श्री नंदनंदन और श्री वृषभानु नंदननि नित्य वास करते हैं, उन युगल चरणों के ही हम अनन्य उपासक हैं।

  14. हम कब होहिंगे ब्रजवासी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (104)

    विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास जी के शब्दों में ऐसा कब होगा की हम सच्चे ब्रजवासी बन जाएंगे, क्यूंकि हमारे ठाकुर श्री कृष्ण हैं एवं श्री राधारानी सी हमारी ठकुरानी हैं | ऐसा कब होगा की हमें हमारी प्राण प्यारी सखियाँ, हरिदासी (ललिता सखी), हरिवंशी (हित सखी) का संग भी मिलेगा |

  15. राधा गोपीनाथ मंदिर, वृंदावन

    वृजनाभ, भगवान श्री कृष्ण के परपोता ने के पांच हजार साल पहले वृंदावन में मूल राधा गोपीनाथ देवता कीस्थापना की थी। लगभग पांच साल पहले, परमानंद भट्टाचार्य ने यमुना के तट पर बंशीवट में धरती के देवता की खोज की थी। चैतन्य महाप्रभु के करीबी सहयोगी श्री गडधर पंडित के एक शिष्य मधु पंडित गोस्वामी ने गोपीनाथ देवता की पूजा की थी।