धन धन वृन्दावन में वसैं कुम्हार - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (98)
वृंदावन में रहने वाले कुम्हार धन्य हैं—वे चाक चलाकर ब्रज रज के सुंदर-सुंदर बर्तन बनाते हैं और करूवा एवं कुलरा (कुल्हड़) गढ़ते हैं।
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वृंदावन में रहने वाले कुम्हार धन्य हैं—वे चाक चलाकर ब्रज रज के सुंदर-सुंदर बर्तन बनाते हैं और करूवा एवं कुलरा (कुल्हड़) गढ़ते हैं।
मुझे श्री वृन्दावन की धूलि (रज) ही प्यारी लगती है । इस वृंदावन धाम की रानी श्री राधा हैं एवं राजा मोहन हैं जिनका राज सदा भरपूर है ।
श्री किशोरी जी के अरुण रंग के दोनों चरण के तलवे ऐसे हैं मानो साक्षात प्रेम के घर (धाम) हों ।
हे किशोरी जू, मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये, जहाँ मैं हाथ में करुवा लेकर एवं गले में प्रसादी गूंजा माला धारण कर कुञ्ज में निवास प्राप्त करूँ ।
कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी ।
हे बिहारीदास! ब्रज में प्रसिद्ध करुवा और कामरी की रहनी से ही बसना चाहिए। ब्रजवासियों के घर से जो टूक-भात मिले, उसी में संतोष रखो।
मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा ।
हाथ में जल का पात्र (करुवा), शरीर पर लंगोटी (कौपीन) और ओढ़ने के लिए काली कमली धारण कर अर्थात् समस्त सांसारिक वासनाओं का भली भांति त्याग कर, जब तुम वृन्दावन के कुंजों और यमुना के तटों पर प्रेम से विचरण करोगे, तभी रस-मय युगल श्री बिहारी बिहारिनी जू तुम्हें मिलेंगे। श्री नागरिदेव जी कहते हैं कि ऐसी स्थिति में ही उस दिव्य युगल की अंतरंग सेवा (खवासी) प्राप्त हो सकेगी।
हे वृंदावन! ऐसा मेरा मन कब करोगे जब में हाथ में करूवा और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर वृन्दावन की कुंजों के मध्य में बस जाऊँगा ।
मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।
नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।
साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज के दर्शन करे ।
श्री स्वामी ललितकिशोरीदास जी का जन्म सं. १७३३ में भदावर राज्य के किसी गाँव में एक ब्राह्मण कुल में हुआ। माता पिता ने इनका नाम गंगाधर रखा। युवावस्था में ही उन्हें (श्री स्वामी ललितकिशोरीदास जी) को वैराग्य हो गया।
मन लगाकर मन को स्थिर कर एकाग्र करके प्रिया प्रियतम में प्रीति करें और सब का परित्याग करके हाथ में केवल मृतिका (मिट्टी का पात्र) करुवा धारण करें और ब्रज की सुंदर गलियों में सोहनी बुहारी देते रहें ।
श्री बिहारिन दास, श्री स्वामी हरिदास जी के आशीर्वाद से दिल्ली के श्री मित्रसेन को पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। स्वामी श्री हरिदास जी ने उनका नाम रखा था बिहारिन दास। मित्र सेन सूरध्वज ब्राह्मण थे।
भगवतरसिकजी कहते है कि ब्रज रज निर्मित करवा का पानी परम पवित्र होता है।