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  1. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  2. जो मन मोहन करत बस - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.3)

    जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।

  3. धन-धन वृन्दावन के लवा बटेर - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (72)

    धन्य हैं श्री वृन्दावन के लवा और बटेर पक्षी। बाज के भय से वे दिन-रात कुंजों की ओट के भीतर दुबकेहुए बैठे रहते हैं, फिर भी कभी वृन्दावन छोड़कर बाहर नहीं जाते और सदा कुंजों की शरण लिए रहते हैं।

  4. मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

    हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।

  5. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  6. लाल संग लै पौढी ललनां - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (65)

    परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।

  7. हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

    हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।

  8. वंदे श्री वृंदावन धाम - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (3)

    मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।

  9. जै जै कीरति लाड़ली जै नँदनँदन अधार - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    कीर्ति कुमारी श्री लाडिली जी (श्री राधा) की बारम्बार जय-जयकार हो, जो नंदलाल (श्री कृष्ण) के जीवन का एकमात्र आधार हैं। उन परम रस की पुंज, स्वामिनी जी की सर्वदा जय हो, जो अपने दासों के हृदय का सार तथा उनकी परम आशा हैं।

  10. मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

    श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।

  11. कौन कहै को सुनें लाल कछुवै नहिं जानत - श्री मनोहर दास, रसिक कर्णाभरण (163)

    कौन कहे और कौन सुने, लालजी (श्री कृष्ण) को श्री राधा के अतिरिक्त कुछ भी सुध-बुध नहीं है। वे अपनी प्राणप्रिया, एकमात्र स्वामिनी श्री राधिका जू के अभाव में इस समस्त संसार को सर्वथा शून्य और सारहीन अनुभव करते हैं।

  12. कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

    श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।

  13. लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)

    मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।

  14. अतिहिं लालची लाल पिय - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, अनुराग लता (34)

    लाल जी (श्री कृष्ण) श्री राधा के रूप का रसास्वादन करने के लिए अत्यंत लालची रहते हैं, वे सदा उनको निरंतर निहारते रहते हैं, फिर भी उन्हें तृप्ति नहीं होती। प्रिया जी के सौंदर्य रूपी वन का दर्शन कर उनके नेत्र इस प्रकार उलझ गए हैं कि वे वहाँ से हटने का नाम ही नहीं लेते।

  15. टेरत श्यामाश्याम को दया विरह बिहाल - श्री दयाबाई

    श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।

  16. सुखकारी सबके सदा - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (146)

    नित्य-नवीन प्रेम से परिपूर्ण श्रीलाड़िलीलाल (श्रीराधा-कृष्ण) समस्त सखी-सहचरियों के प्राणों के आधार और जीवन-धन हैं। वे परम सुख प्रदान करने वाले हैं और सदैव अपने भक्तों के प्राणों की रक्षा करने वाले हैं।

  17. प्यारे को नचवत प्रिया कबहुँ लकुट लै त्रासि - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (93)

    प्रिया जी (श्री राधा) अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नाचना सिखा रही हैं, और कभी-कभी वे अपने हाथ में लकुटी (छड़ी) लेकर उन्हें तनिक डराती भी हैं। जैसे-जैसे लाड़िली जी उन्हें नचाती हैं, श्री कृष्ण उनके अधीन होकर बिल्कुल वैसे-वैसे ही नाचते हैं।

  18. इतनौं कह्यौ हमारौ कीजे - श्री हित चतुर्भुजदास

    हे प्रिया-प्रियतम! मेरी यह लघु प्रार्थना स्वीकार कीजिये। जिस प्रकार श्री वृन्दावन धाम इस भूतल पर साक्षात् सुशोभित है, उसी प्रकार आप इस परम पावन धाम को मेरे हृदय-कमल में भी प्रतिष्ठित कर दीजिये।