लाल कैं यह मन ललक रहै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (27)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी।
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श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी।
हे सखी! जब से नंदजी का लाडला श्रीकृष्ण मेरे हृदय में आ बसा है, तब से मुझे समस्त सुखों की प्राप्ति हो गई है; उसने बस मेरी ओर थोड़ा-सा देखकर और मुड़कर जो मंद-मंद मुस्कान बिखेरी थी, उसी ने मेरे मन को पूरी तरह से हर लिया है।
अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]
श्री राधारानी के चरण अत्यंत सुंदर, हितकारी और भक्तों के मन को प्रिय लगने वाले हैं, जो सभी संकटों का हरण करने वाले तथा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।
कुंज के अधिपति युगल किशोर की आरती उतारिए। इन नित्य नवीन लाड़िली जी और अलबेले लाल जी की अनुपम छवि को अपने नेत्रों से निहारकर पूर्ण रूप से तृप्त हो जाइए।
हे सुख की सागर, श्री लाड़िली किशोरी जी (श्री राधा)! जैसे आपने अपनी अगाध कृपा करके मुझे श्री धाम वृन्दावन में वास प्रदान किया है, वैसे ही समस्त ब्रजवासी जन भी मुझ पर अपनी सहज कृपा-दृष्टि बनाए रखें एवं मेरा किसी ब्रजवासी के प्रति स्वप्न में भी अपराध न बने।
मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।
जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।
धन्य हैं श्री वृन्दावन के लवा और बटेर पक्षी। बाज के भय से वे दिन-रात कुंजों की ओट के भीतर दुबकेहुए बैठे रहते हैं, फिर भी कभी वृन्दावन छोड़कर बाहर नहीं जाते और सदा कुंजों की शरण लिए रहते हैं।
हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।
आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।
परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।
हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।
मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।
कीर्ति कुमारी श्री लाडिली जी (श्री राधा) की बारम्बार जय-जयकार हो, जो नंदलाल (श्री कृष्ण) के जीवन का एकमात्र आधार हैं। उन परम रस की पुंज, स्वामिनी जी की सर्वदा जय हो, जो अपने दासों के हृदय का सार तथा उनकी परम आशा हैं।
श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।
कौन कहे और कौन सुने, लालजी (श्री कृष्ण) को श्री राधा के अतिरिक्त कुछ भी सुध-बुध नहीं है। वे अपनी प्राणप्रिया, एकमात्र स्वामिनी श्री राधिका जू के अभाव में इस समस्त संसार को सर्वथा शून्य और सारहीन अनुभव करते हैं।
श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।