nandini
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भ्रंसिन्या - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (49)
अरे मन! श्री कृष्ण के चरण कमलों के प्रेमधन को नष्ट कर देने वाली स्त्रियों के परिहासमय स्नेह वचनों में फँस कर प्रेमधन से वञ्चित मत हो। पुत्र-मित्र-वैभवों को नश्वर जान कर उनकी आकांक्षा मत करो। निरन्तर राधादास्य प्रदानकारी वृषभानुनन्दिनी सरसी अर्थात् श्री राधाकुण्ड का ध्यान करो।
सुनियें अरज हमारी श्रीवृषभानु कुमारि - श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली (87)
हे श्रीवृषभानु-नन्दिनी श्री राधा! मेरी इस करुण विनय को कृपापूर्वक स्वीकार कीजिए। हे प्रियतम (श्रीकृष्ण) के प्राणाधार स्वरूपा स्वामिनी! अपनी करुणा-दृष्टि से मुझे अनुग्रहित कर अपने दिव्य एवं मनोहर स्वरूप का दर्शन प्रदान करें।
दोऊ राजत स्यामा स्याम - श्री सूरदास, सूरसागर (1696)
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं।
जय जय श्री ललिता ललित - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)
श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं।
भानुनन्दिनी मो तन हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)
हे भानुनन्दिनी, श्री राधा! मेरी ओर कृपा-दृष्टि डालिये। विषय-वासनाओं से मेरा हृदय तप रहा है— अपनी कृपा-कटाक्ष का एक कण बरसा कर इसे शीतलता प्रदान कीजिए
वृषभानु नन्दिनी दुरन्त की निकन्दिनी हैं - ब्रज के कवित्त
वृषभानु-दुलारी श्री राधा दुरन्त (अत्यन्त कठिन) दुःख-मोह को नष्ट करने वाली हैं। वे नन्द-नन्दन (श्रीकृष्ण) को सदा आनन्द प्रदान करने वाली हैं।
हम भूखे ब्रज की गारी के - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ।
गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)
पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है।
भजो कीरति नन्दिनी श्रीश्यामा - श्री वंशी अलि
कीर्ति नंदिनी श्री राधा का अनन्य भजन करो। वे वृषभानु बाबा की अति ही लाड़िली पुत्री हैं एवं जिनके भैया श्रीदामा ने उन्हें लाड़ लड़ाया है।
पूनम की रजनी सजनी यह - ब्रज के सवैया
हे सखी, आज पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि है — चारों ओर फैली चाँदनी मन को अत्यंत सुखद अनुभूति दे रही है।
श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (37)
श्री बिशोक नंदिनी, श्री ललिता जी के अतिरिक्त और कौन है जो मेरे जैसे पतित जीव का उद्धार और निर्वाह कर सके? ऐसी अहेतुकी करुणा और अनंत दया तो केवल श्री ललिता सखी को ही शोभा देती है।
फूल्यो री सघन वन तामे - श्री सूरदास, सूर सागर
हे प्यारी जू! देखो, वृंदावन के सघन कुंज किस प्रकार पुष्पों से भरकर अपनी अनुपम शोभा बिखेर रहे हैं। इन लताओं में कोयल मधुर स्वर में गान कर रही है, मानो प्रेम का संदेश सुना रही हो।
नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (84)
श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।
तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)
हमारा तन, मन और सर्वस्व तो लड़ैती जू (श्री राधा) का ही है, और हमारा जीवन भी वृषभानु नंदिनी श्री राधा ही हैं।
हियके लोचन गड़ी रूपकी चटक विकट है - श्री वृंदावन दास चाचा जी
हित रूप लालजी की ह्रदय की आँखें श्री राधा के रूप पर अटकी हुई हैं, और उनके ह्रदय की चाह इतनी गहरी है कि कोई उसे समझ नहीं सकता। वे “हा राधा, हा राधा” यही रटते जा रहे हैं।
प्रेम पंथ को पैड़ौ ही न्यारो - श्री किशोरी अलि
दिव्य प्रेम का मार्ग अद्वितीय और निराला है। इसे वृषभानु-दुलारी श्री राधा और व्रजराज श्री कृष्ण से अधिक कौन जान सकता है?
हमारी हेली स्वामिनी परमदयाल - श्री सरस माधुरी
हमारी स्वामिनी (श्री राधा) परम दयालु हैं । कीर्ति कुमारी अत्यंत कृपालु हैं एवं सदा श्री श्यामसुन्दर को सम्मान देती हैं ।
प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7)
दिव्य युगल किशोर-किशोरी की जोड़ी कुंज-भवन में केलि-परायण है।
रजधानी वृंदा विपिन भानु सुता कौ राज - ब्रज के दोहे
ब्रज की परम राजधानी श्रीवृंदावन धाम में वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधा का अखंड राज है। जहाँ साक्षात यमराज का प्रवेश भी सर्वथा वर्जित है, वहाँ भला वे किसी जीव का क्या अहित कर सकते हैं?
हे वृषभानुराज-नन्दिनि - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, षोडश गीत (5)
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, हे अतुल-प्रेम-रस-सुधा निधान, मैं तो वन-वन भटकता हुआ गाय चराता हूँ, मैं प्रेम-विधान क्या जानूँ ?