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  1. शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (76)

    नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ।

  2. प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (78)

    जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-कर्ती हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा समस्त ऐश्वर्य शक्तियाँ पार्वती, इन्द्राणी और महासुख स्वरूपा की स्वतन्त्र सुखमय वपुधारिणी शक्ति हैं; वे श्रीवृन्दावन के नाथ की पटरानी 'श्रीराधा' ही केवल मेरी सेव्या एवं आराध्या हैं ।

  3. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  4. श्री वंशी अलि जी की जीवनी

    श्री नाभा दास जी ने भक्तमाल ग्रंथ में श्रीमद्भागवत के महा पंडित श्री नारायण मिश्र जी का एक छप्पय में चरित्र गान किया है। यह नवला वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। श्रीमद्भागवत के मनन चिंतन से सहज ही ब्रज धाम के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया और ब्रज वास की इच्छा से मथुरा पधारें।

  5. श्री कामेश्वर महादेव, काम्यवन

    आखिर कामेश्वर नाम क्यों पड़ा? उनके अनेक नाम हैं - नीलकंठ, चंद्रमौलि, गंगाधर, शम्भो, शंकर किन्तु कामेश्वर होने का एक विशेष कारण है

  6. श्री पौर्णमासी देवी (योगमाया मंदिर), वृंदावन

    श्री पौर्णमासी पूरी तरह से श्री राधा कृष्ण के लिए भोग की सबसे उत्तम व्यवस्था करने में सक्षम हैं। व्रजवासियों द्वारा इनके चरण कमलों की पूजा की जाती है।

  7. सबै शक्ति हैं नाम में - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (18)

    हे मन! भगवान के नामों में समस्त शक्तियाँ समाहित हैं, इसलिए तू रात-दिन केवल उसी का आराधन कर। किंतु स्मरण रहे, जो मनुष्य नामापराध करते हैं, उन्हें नाम की इन अगाध शक्तियों का कोई लाभ प्राप्त नहीं होता। नाम की महिमा तभी फलित होती है जब उसे अपराध-रहित होकर जपा जाए।

  8. वन्दे वृन्दावनानन्दाम् राधिकाम् परमेश्वरीम्

    मैं श्री राधिकाजू को बार-बार नमन करता हूँ जो श्री वृंदावन की महारानी हैं । वह सभी गोपियों की ईश्वरी है, परमानंद की स्रोत और अवतार में सर्वश्रेष्ठ हैं।

  9. यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.109)

    जिसकी करुणा अनन्त है, जिससे अधिक और सुख कहीं भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह श्रीवृन्दावन जिनका असीम विचित्र शक्ति-युक्त क्रीड़ा-उद्यान है, उस श्रीराधा का करुणा कटाक्ष न होने पर जो कुछ और समस्त है वह अत्यन्त तुच्छ है, दृष्टांततः मैं भी अज्ञानता के आधीन होकर जब ‘मेरे प्रति श्रीराधा की कृपा नहीं है’ ऐसा मन में सोचता हूँ तो तीव्र आर्त्त हो कर व्याकुल हो उठता हूँ ।

  10. शिक्षाष्टकम - श्री चैतन्य महाप्रभु

    चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस, सभी को पवित्र करने वाले श्रीकृष्ण कीर्तन की उच्चतम विजय हो॥