20 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  2. जुगलवर को यह सुरत बिहार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (100)

    जो कोई अधिकारी इस “सुरत-सुख” का स्मरण करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम रीझ जाते हैं और उसे सुरत-सुख से उत्पन्न अति दुर्लभ उस काम-रस सुख को प्रदान करते हैं, जो रस-विधि और प्रेम-लक्षणा भक्ति से भी परे है।

  3. श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

    माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।

  4. राधेत्येवं च संसिद्धा - ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 223)

    'राधा' नाम यह स्वयं सिद्ध है जिसमें 'रा' कार दान वाचक है। स्वयं निर्वाणदात्री होने से वह 'राधा' कहलाती हैं ।

  5. यहै उपदेस उपाइ श्रीबिहारिनिदासि - श्री नागरीदेव जु की वाणी (5)

    इस अद्भुत नित्य-विहार रूपी सर्वोपरि रस के उपदेश को एक मात्र गुरुदेव (श्री बिहारिन दास जी) की कृपा से ही समझा जा सकता है, क्योंकि नित्य-सिद्धों (एवं उनके कृपा-पात्र जनों) के अतिरिक्त इस मर्म को और कोई नहीं समझ सकता।

  6. प्यारे प्रेम भूमि श्री वृंदावन - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री प्यारी जी की गेंद लीला (23)

    अरे प्यारे, वृंदावन की भूमि प्रेम से ओतप्रोत है । यहाँ के जड़ और चेतन सभी प्रेमी जन ही हैं जो श्यामा श्याम के भाव रस में भरे हुए हैं । यहाँ न तो कोई साधक है न सिद्ध है, यहाँ सब ही कृपापात्र जन हैं ।

  7. श्रीनाथजी मंदिर, पूंछरी, गोवर्धन

    श्रीनाथजी का मंदिर पूंछरी, गोवर्धन में स्थित है । गोवर्धन जी का आकार मयूर के समान है एवं पूंछरी गोवर्धन जी की पूंछ है, ऐसी मान्यता है ।

  8. नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड, गोवर्धन

    नवल कुंड पूर्व में पूँछरी के निकट होने से 'पूँछ कुण्ड' नाम से जाना जाता था, परन्तु भरतपुर की महारानी नवल के द्वारा इसे 'नवल कुण्ड' की संज्ञा दी गई। वैसे नित्य नवल नन्दनन्दन का कुण्ड होने से भी यह नवल कुण्ड है।

  9. श्री प्रियादास जी की जीवनी 

    भक्त प्रवर श्री प्रियादास जी का जन्म सूरत-नगर के राजपुरा नामक ग्राम में हुआ था। इनका जन्म 1683 से कुछ पूर्व का अनुमानित है।

  10. श्री पीताम्बर देव जी की जीवनी

    नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।

  11. संभु सुर ध्यावैं सदा सेस गुन गावै विधि - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (55)

    भगवान शिव एवं समस्त देवता श्री राधारानी का सदैव ध्यान करते हैं, शेषनाग गुणों का गान करते हैं तथा जिनके मुख से वेद प्रकट हुए हैं वे ब्रह्मा जी भी प्रयत्न करने पर भी श्री राधारानी का पार न पा सके।

  12. वृंदावन के मोटे गणेश की महिमा

    वृंदावन में मोटा गणेश मंदिर, वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के पास अठखंबा में स्थित है। ब्रज के पूरे क्षेत्र में, यह एकमात्र स्थान है जहाँ स्वयं सिद्ध श्री मोटे गणेश जी के दर्शन होते हैं।

  13. वसुधा के सुधा जग की सुखमा - श्री छबीले जी

    श्री कृष्ण इस धरती पर अमृत स्वरूप हैं, इस जग के परम ऐश्वर्य हैं, जिन्हें मुनि जन अपने हृदय में सदा के लिए बसाये रहते हैं। वे श्री राधा के परम धन हैं। श्री कृष्ण सुख के स्रोत हैं, जो सदा सबके दुखों का नाश करते हैं। देवता और सिद्धजन अपनी समाधि में जिनका ध्यान करते हैं और जिनके संग के लिए सदैव लालायित रहते हैं।

  14. राधेति सिद्धमन्त्रं द्व्यक्षरमुच्चार्य किं न सिध्येयम्

    सर्व धर्महीन होकर भी, सब कुकर्म करते हुए भी, ‘‘राधा’’ इन दो अक्षरों का सिद्ध-मन्त्र उच्चारण करके क्या तू भजन की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता?

  15. श्री भागवत निवास, वृंदावन

    भागवत निवास की स्थापना श्री कृपासिंधु दास बाबा ने लगभग 80 वर्ष पूर्व 1945 के आसपास की थी । श्री कृपासिंधु दास बाबा सिद्ध श्री पण्डित बाबा (श्री राम कृष्ण दास बाबा) के कृपापात्र थे ।

  16. अपि सर्वधर्महीनः सर्वकुकर्मावलेश्च निर्माता - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.13)

    सर्व धर्महीन होकर भी, सब कुकर्म करते हुए भी, ‘‘राधा’’ इन दो अक्षरों का सिद्ध-मन्त्र उच्चारण करके क्या तू भजन की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता?

  17. गतो राधापति स्थानं यत्सिद्धैरप्य गोचरम् - पद्म पुराण 

    श्रीप्रिया-प्रियतम के उस स्थान में पहुँचना जो सिद्धों (मुक्त पुरुषों) के लिए भी अगोचर है, जिसकी स्थिति गोलोक से भी ऊपर है, जिसका नाम नित्य वृन्दावन है, जहाँ नित्य रास आदि रसोत्सव होते रहते हैं, जो स्थान पूर्ण प्रेमरसात्मक, अत्यन्त गुह्य तथा अदृश्य है।

  18. अज सिव सिद्ध सुरेश मुख - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (3)

    ब्रह्मा, शिव, सिद्धजन, देवतागण तथा देवताओं के राजा भी नित्य ही श्री राधा-नाम का जप करते हैं। समस्त प्रकार की बाधाएँ राधा-नाम के जप से समाप्त हो जाती हैं।

  19. प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (38)

    भगवत रसिक जी साधकों से कहते हैं कि जिस वृन्दावन धाम में ये (निम्नलिखित) सात सिद्ध विग्रह विराजमान हैं, उसमें रसिक संतो की संगत करते हुए साधक को निवास करना चाहिए।) 1. श्री रुपगोस्वामी के प्राण प्यारे ठा० श्री गोविंद देव जी 2. ठा० श्रीमदनमोहन जी महाराज, जिन्हें श्री सनातन गोस्वामी ने सदा अपने पवित्र हृदय में विराजमान किया था

  20. हमारो धन श्री राधे जू को नाम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदीरा, दैन्य माधुरी (101)

    श्री राधा का नाम ही हमारा वास्तविक धन है। श्री राधा-नाम की कृपा से ही सर्वोच्च भगवान श्यामसुन्दर रसिकों के शिरोमणि रूप में विख्यात हुए।