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पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
आज बंशीवट वरषत रंग यमुना - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (20)
आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं।
साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)
हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।
नमो कृष्ण जै नित्य विहारी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।
लाल संग लै पौढी ललनां - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (65)
परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।
रसिक शिरोमनि सांवरो गौरी अद्भुत रूप - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (2)
रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित्य विहार करते हैं।
यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.99)
जहाँ अत्यन्त प्रेमरस में मग्न होकर मेरे प्रियतम युगल (राधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं, जहाँ भक्ति महारसमय उत्सव की तरह निरन्तर प्रवाहित हो रही है, जहाँ वेद उपनिषत् की गूढ़ वाणियाँ प्रवेश नहीं प्राप्त कर सकतीं, उसी पावन श्रीवृन्दावन में मेरी बुद्धि प्रेमपूर्वक सदा लगी रहे।
नामी नाम न भावई - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (132)
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)
हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।
प्राणनाथ या जगत में सो अभागिनी नार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, रास पंचाध्यायी लीला (11)
एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।
वृन्दावन महिमा अपरम्पार - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)
श्री वृन्दावन धाम की महिमा अनंत और अपार है। यहाँ श्यामसुन्दर रसास्वादन करने वाले भोक्ता हैं, श्री श्यामा जू (राधा) साक्षात् रस स्वरूपा हैं, और वृन्दावन इन दोनों की लीलाओं का आधार है।
जीवन मुक्तन को जहां है नाहीं अधिकार - श्री चरणदास
श्री चरणदास जी कहते हैं कि जहाँ उन महापुरुषों को भी प्रवेश का अधिकार नहीं है जो जीवन-मुक्त हैं, उस परम गोपनीय निकुंज धाम में श्री शुकदेव जी सखी स्वरूप धारण कर, श्री राधा-कृष्ण के उस 'नित्य विहार' रस का निरंतर अवलोकन करती रहती हैं।
चलो लाल खेलें बसंत - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विलास, वसन्त लीला (14)
हे लाल (प्रियतम)! आओ, हम श्री यमुना के तट पर मिलकर वसंत खेलें। वन के निकुंजों में नई ऋतु आई है और नये-नये फूल खिल उठे हैं।
तोसी न निहारी मैं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)
हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है?
परम प्राण धन कुंज में करत विहार विशाल - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (36)
प्राणों के परम प्राण-धन, आनन्द-सिन्धु के चन्द्रस्वरूप श्री युगल राधा–माधव श्री धाम वृन्दावन के कुंजों में नित्य विहार परायण हैं ।
बंदौं श्रीहरिदास के चरन कमल चित लाइ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)
मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।
श्री वृषभान कुमार नित नाम कुँवर नंदनन्द - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (4)
श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते हैं।
बन गहबर सर प्रेमसर, घाट श्रीयुगल बिहार - श्री चरणदास
वनों में गह्वर वन, सरोवरों में प्रेम सरोवर, घाटों में श्री युगल-विहार घाट, गलियों में कुंज गलियाँ और पर्वतों में श्री गोवर्धन परम रमणीय हैं।
श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)
जो स्वामी हरिदास जी के अनन्य जन हैं, वे युगलवर, श्री श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार रूपी रस-केलि में ही अपने मन को लगाते हैं तथा युगल किशोर दंपति की रूप-रस माधुरी का नित्य अपने नयनों से पान करते रहते हैं।
सहज बिहार निरन्तर मेरौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (103)
प्रिया-प्रियतम की कृपा से उनका नित्य विहार मुझे अब सहज उपलब्ध है। दोनों प्रिया-प्रियतम तन-मन से एक होकर विहरण करते हैं, और हर क्षण प्रेम और भी अधिक गहरा होता रहता है।