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परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)
जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।
तिष्ठेद्युगसहस्रं तु पादेनैकेन वराहपुराण, मथुरा महात्म (165.60)
जो मनुष्य एक हजार युगों तक एक पैर पर खड़ा रहता है (तपस्या करके), उससे कहीं अधिक फल मथुरा (ब्रज) निवासी प्राप्त करता है ।
जुगुललाल तोरी पैयां परतहौं - श्री ललित माधुरी
हे युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण! मैं आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ — कृपा करके एक बार मेरी ओर दृष्टि डालिए। मुझे वृंदावन वास प्रदान कीजिए क्योंकि वृंदावन से बाहर बिताया हुआ प्रत्येक क्षण जीवन की अपूरणीय क्षति है ।
जोगी जती तपसी किन होऊ - ब्रज के सवैया
योगी, जती, और तपस्वी होकर, सिर मुंडाकर, हर द्वार पर भिक्षा मांगने से क्या लाभ?
मन तू वृंदावन के मारग लागि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92)
अरे मन, तू वृंदावन के मार्ग का अनुसरण कर। तेरा यहाँ कोई नहीं है और न ही तू किसी का है; संसारिक मोह-माया को त्याग कर तू भाग चल।
कलिकाल कलेशन काटें सबै - श्री छबीले जी
श्री राधा नाम का जप करने से कलिकाल के समस्त कष्ट और क्लेश दूर हो जाते हैं। यह नाम जीवन के मार्ग में आने वाले सभी कंटकों को समाप्त कर देता है और भवसागर की समस्त बाधाओं को मिटा देता है।
निस दिन आस बन बास की लगी ही रहै - श्री किशोरी अलि
श्री वृंदावन वास की ही आशा निश दिन लगी रहे, बस एक यही उपाय विचारना चाहिए।
सदा राधाकृष्णोच्छलदतुल - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (3)
मैं युग के समान अति दीर्घकाल पर्यन्त विरही होते हुए भी सदा श्री राधा कृष्ण के उल्लासयुक्त अतुलनीय लीलास्थल इस ब्रजधाम को त्यागकर पूर्ण एश्वर्य से दीप्तिमान श्री यदुपति को, उनके कहने पर भी उनके दर्शन करने के लिए क्षणमात्र को भी श्री द्वारिका नहीं जाऊँगा ।
अहो कृष्ण करुणा करौ - श्री वृंदावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (87)
अहो कृष्ण! कलियुग का प्रभाव अत्यंत प्रबल हो उठा है। कृपा कर मेरे हृदय की व्यथा हर लीजिए और अपनी करुणा से मुझे संरक्षण प्रदान कीजिए।
मधुवन - ब्रज की महिमा
मधुवन ब्रज के प्रसिद्ध 12 वनों में से एक है । सतयुग में मधु नामक एक दैत्यका भगवान ने यहाँ वध किया था । इस कारण भगवान का नाम मधुसूदन हो गया । अतः भगवान् श्रीमधुसूदन के नामपर इस वनका नाम मधुवन पड़ा है, क्योंकि यह मधुवन भगवान् श्रीमधुसूदन के समान ही प्रिय एवं मधुर है ।
करत इन्हीं कौ ध्यान ईस सनकादिक से - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, चरण वर्णन (2)
सनकादि जैसे ईश्वर-कोटि के भक्त भी जिन श्री चरणों का ध्यान करते हैं, और जिनका यशोगान संतगण नित्य ही झांझ लेकर करते हैं।
हनुमान गढ़ी मंदिर, वृन्दावन
हनुमान गढ़ी मंदिर वृन्दावन में ब्रह्म कुण्ड के समीप में स्थित है। यहाँ श्री हनुमान जी ने बैठ कर श्री राम जी का चिंतन किया था। इसलिए इसे शांति पीठ कहते है।
श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की जीवनी
श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज अखिल भारतीय जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ (सलेमाबाद, किशनगढ़) के एक सुप्रतिष्ठित आचार्य थे। इनकी विद्वत्ता और भक्ति भावना इनकी वाणी के अनुशीलन से स्पष्ट हो सकती है।
श्री पीताम्बर देव जी की जीवनी
नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।
वृंदावन के मोटे गणेश की महिमा
वृंदावन में मोटा गणेश मंदिर, वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के पास अठखंबा में स्थित है। ब्रज के पूरे क्षेत्र में, यह एकमात्र स्थान है जहाँ स्वयं सिद्ध श्री मोटे गणेश जी के दर्शन होते हैं।
ब्रज में ब्रह्मा, विष्णु और शिव पर्वत के रूप में स्थित हैं
बरसाना में, भगवान ब्रह्मा ने पर्वत का रूप धारण किया जिसे "ब्रह्म पर्वत" कहा जाता है।
किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
भावार्थ - हे किशोरी जी ! मैं तुम्हारे चरणों की बलैया लेता हूँ | इन चरणकमलों की लालिमा की उपमा ढूँढकर थक गया, कहीं नहीं पाता | इन्द्र वधूटी ( एक लाल रंग का बरसाती कीड़ा ), गुलाल एवं आम के नये पते आदि की उपमा देने में लज्जा लगती है | कोमलता में गुलाब एवं मक्खन भी फीके लगते हैं |
जीवनी श्री बिहारिन दास - वृंदावन के रसिक संत
श्री बिहारिन दास, श्री स्वामी हरिदास जी के आशीर्वाद से दिल्ली के श्री मित्रसेन को पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। स्वामी श्री हरिदास जी ने उनका नाम रखा था बिहारिन दास। मित्र सेन सूरध्वज ब्राह्मण थे।
बाँके बिहारी मंदिर दर्शन और इतिहास
प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन के गुरु, स्वामी श्री हरिदास जी (द्वापर युग में ललिता सखी) ने श्री बाँके बिहारी जी मंदिर की स्थापना की गई थी।
रटो रे मन ! छिन छिन राधे नाम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त-माधुरी (87)
हे मन ! क्षण-क्षण निरन्तर प्रेमपूर्वक राधे नाम का संकीर्तन कर। जिस राधे नाम को ब्रह्मा, विष्णु आदि की तो कौन कहे, स्वयं साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण भी रटा करते हैं।