तत्त्वज्ञान

वेदों, शास्त्रों के लेखन, रसिक संतों द्वारा छंद, जो आध्यात्मिक और रसोपासना पर गहन ज्ञान प्रदान करता है।

22 तत्वज्ञान लेख उपलब्ध हैं

  1. नवरत्नम् - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

    जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान नहीं करेंगे।

  2. शिक्षापद्यानी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

    यदि तुम श्री कृष्ण से विमुख हो जाओगे तो कालिकाल के प्रभाव में रहने वाले तुम्हारा तन और मन समय के प्रवाह से तुम्हारा नाश कर देंगे ऐसा मेरा विश्वास है । श्री कृष्ण सांसारिक नहीं हैं और न ही वे सांसारिक लोगों की पूजा को स्वीकार करते हैं ।

  3. को सरि करै हमारी राधा - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (151)

    हमारी सर्वोपरि नित्यबिहारिनी स्वामिनी स्वरूपा श्री राधा की समानता कौन कर सकता है? यद्यपि श्री राधा नाम महात्म के आधार पर उपासक श्री राधा को एक समान ही समझते हैं, परंतु श्री राधा का भी सूक्ष्म से सूक्ष्म से अति सूक्ष्म रस है, अर्थात् श्री राधा के भी अन्य वैस [स्वरूप] इस अति अद्बुत नित्य विहार रस में बाधा ही हैं ।

  4. भक्तिवर्धिनी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

    अब मैं भक्ति की वृद्धि करने का उपाय बताता हूँ। जब भक्ति का बीज दृढ़ हो जाता है तो उस भक्ति को सांसारिक आसक्ति के त्याग से, कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से बढ़ाया जा सकता है ।

  5. श्री कृष्णाश्रय - श्री वल्लभाचार्य

    हे प्रभु ! कलियुग में सर्व मार्ग नष्ट हो चुके हैं और दुष्ट लोग धर्माधिकारी बन गए हैं, संसार में पाखंड ही पाखंड है, इसलिए हे भगवान श्रीकृष्ण, केवल आप ही मेरे आश्रय हो ।

  6. श्री यमुनाष्टकं - श्री वल्लभाचार्य

    मैं श्री यमुना जी को प्रणाम करता हूँ जो समस्त सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं । श्री यमुना जी के छोर की रज श्री कृष्ण के चरण कमल के समान चमक रही है । श्री यमुनाजी के तट पर स्थित कुंजों के फूलों की सुगंध से यमुना जी का पानी भी सुगंधित है। समस्त विनम्र एवं चतुर गोपियां यमुना जी की भक्ति करती हैं । श्री यमुना जी श्री कृष्ण की सुंदरता अपने में समेटे हुए है ।

  7. मधुराष्टकम् - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

    (हे कृष्ण!) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी आंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के इष्ट हैं श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।

  8. प्रथम महातम प्रकृति - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

    आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवतरसिकजी कहते हैं:

  9. सखी भाव का प्रादुर्भाव - नारद पुराण

    श्री कृष्ण नारद से कहते हैं: मैं यह बार बार शपथ लेकर कहता हूँ बिना राधिका जी की कृपा के मेरी कृपा नहीं हो सकती है । श्रीराधिका की अहेतु की कृपा से ही उनकी सखियों का संग प्राप्त होता है। उन सखियों की कृपा से ही सखी भाव मिलता है । इसी क्रम से ही केवल सखी भाव को प्राप्त किया जा सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।

  10. श्रीगान्धर्वासम्प्रार्थनाष्टकम् - श्री रूप गोस्वामी

    हे राधिके! मुझ पर कृपा कर अपना मुख कमल मेरे समक्ष ऐसे प्रकट करें, जब आप और श्री कृष्ण, मद गज के समान प्रेम में लीन वृन्दावन के कुंजो में विहार करते हैं।

  11. श्री युगलाष्टकम - श्री वल्लभाचार्य

    श्री राधा श्री कृष्ण प्रेममयी हैं, एवं श्री राधा प्रेममय श्री कृष्ण हैं । मेरे जीवन का सम्पूर्ण नित्य धन एवं गति युगल सरकार श्री राधा कृष्ण हैं ।

  12. शिक्षाष्टकम - श्री चैतन्य महाप्रभु

    चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस, सभी को पवित्र करने वाले श्रीकृष्ण कीर्तन की उच्चतम विजय हो॥

  13. वृन्दावन में वियोग नहीं है: द्वारिकाधीश की पटरानियां श्री यमुना जी से मिलीं, नित्य विहार रस की व्याख्या

    द्वारिकाधीश की पटरानियों ने यमुना जी को अत्यंत प्रमुदित अवस्था में देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमें तो वियोग कलेशित किये जा रहा है और यमुना जी भी तो श्री कृष्ण की पटरानियों में हैं और यह तो मंद मंद मुस्कुरा रही हैं

  14. श्री कृष्ण के दो अलग-अलग अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु जी रूप गोस्वामी को बताते हैं

    श्री रूप गोस्वामी ने एक बार विचार किया, "श्री चैतन्य महाप्रभु जी की अंततः हृदय की इच्छा को पूरा करने के लिए, मैं एक नाटक लिखूंगा ।

  15. श्री कृष्ण के चार अद्वितीय गुण - भक्ति रस्ममित्त सिंधु, रूप गोस्वामी

    असीमित गुणों से श्री कृष्ण के 64 प्रमुख गुण हैं। साठ गुण तो भगवान के अन्य रूपों में भी पाए जाते हैं। लेकिन चार गुण ऐसे हैं जो केवल श्री कृष्ण में ही पाए जाते हैं जो इस प्रकार हैं:

  16. शरणागति के 6 लक्षण - श्री सनातन गोस्वामी, हरी भक्ति विलास (11.676)

    शरणागति के 6 लक्षण हैं जिन्हें श्री सनातन गोस्वामी जी ने अपने ग्रंथ हरी भक्ति विलास में बताया है। यदि यह 6 लक्षण हैं तो इसी के आधार पर ही माना जा सकता है कि जीव भगवान के शरणागत है या नहीं।