राग झिंझोटी

राग झिंझोटी खमाज थाट का एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय राग है जो चंचल प्रकृति का राग है इसीलिए यह राग वाद्य यन्त्रों के लिये बहुत उपयुक्त है। इस राग को श्रृंगार रस के पदों के लिए भी गाया जाता है । यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया जाता है।

15 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. जापै चढ़े युगल को रंग - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (69)

    जिस पर युगल (श्री राधा-कृष्ण) का रंग चढ़ जाता है, वह उनके अंग-सौंदर्य को निहारकर त्रिभुवन की समस्त सुख-संपत्ति और वैभव को एक क्षण में ही विस्मृत कर देता है।

  2. श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)

    हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ ।

  3. मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

    जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।

  4. साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)

    हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।

  5. अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (71)

    हे स्वामिनी जू (श्री राधे)! अबकी बार तो आपकी कृपा मुझपर होनी बनती है। यह भवसागर अत्यंत विकराल एवं विपुल है, मैं तुम्हारी कृपा के बिना इस भँवर जाल रूपी सांसारिक द्वन्दों से कैसे पार उतर सकता हूँ ?

  6. मेरौ कछु वस नाहिन करुणामई - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (72)

    हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है । मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हूँ ।

  7. प्यारे प्रेम भूमि श्री वृंदावन - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री प्यारी जी की गेंद लीला (23)

    अरे प्यारे, वृंदावन की भूमि प्रेम से ओतप्रोत है । यहाँ के जड़ और चेतन सभी प्रेमी जन ही हैं जो श्यामा श्याम के भाव रस में भरे हुए हैं । यहाँ न तो कोई साधक है न सिद्ध है, यहाँ सब ही कृपापात्र जन हैं ।

  8. श्यामा श्याम लगन जिहिं लागै - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (40)

    जिनको दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम की लगन लग जाती है उनकी आखों से आंसुओं की धारा बहती है और वे युगल छवि का निरंतर चिंतन करते हैं ।

  9. मो सम कौन कुटिल खल बीर - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (27)

    हे मित्र! मेरे समान कुटिल एवं खल कौन होगा जो युगल वर श्री राधा कृष्ण की कथा श्रवण कर नैनों से आंसुओं का प्रवाह भी नहीं बहाता ।

  10. प्यारी जू तुम्हीं हौ गति मेरी - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (70)

    हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो । मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए ।