सुनिये नाथ गरीब निवाज - श्री युगल प्रिया
हे नाथ, दीनों के पालनहार! मैं आपकी शरण में आ गई हूँ — अब मेरी लाज आपके ही हाथ है।
राग झिंझोटी खमाज थाट का एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय राग है जो चंचल प्रकृति का राग है इसीलिए यह राग वाद्य यन्त्रों के लिये बहुत उपयुक्त है। इस राग को श्रृंगार रस के पदों के लिए भी गाया जाता है । यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया जाता है।
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हे नाथ, दीनों के पालनहार! मैं आपकी शरण में आ गई हूँ — अब मेरी लाज आपके ही हाथ है।
जिस पर युगल (श्री राधा-कृष्ण) का रंग चढ़ जाता है, वह उनके अंग-सौंदर्य को निहारकर त्रिभुवन की समस्त सुख-संपत्ति और वैभव को एक क्षण में ही विस्मृत कर देता है।
हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ ।
जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।
हम उस भूमि के वासी हैं, जहाँ के लोग दिव्य प्रेम रस में मग्न रहते हैं।
हे श्री राधा-कृष्ण, मैं आप पर बलिहारी जाऊँ। सदा श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए, अनन्य भाव से केवल आपका ही गुणगान करूँ।
हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।
हे स्वामिनी जू (श्री राधे)! अबकी बार तो आपकी कृपा मुझपर होनी बनती है। यह भवसागर अत्यंत विकराल एवं विपुल है, मैं तुम्हारी कृपा के बिना इस भँवर जाल रूपी सांसारिक द्वन्दों से कैसे पार उतर सकता हूँ ?
हे श्री राधे! ऐसा कौन सा मुझसे अपराध बन गया कि मेरा वृंदावन वास छूट गया जो मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारा है ।
हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है । मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हूँ ।
अरे प्यारे, वृंदावन की भूमि प्रेम से ओतप्रोत है । यहाँ के जड़ और चेतन सभी प्रेमी जन ही हैं जो श्यामा श्याम के भाव रस में भरे हुए हैं । यहाँ न तो कोई साधक है न सिद्ध है, यहाँ सब ही कृपापात्र जन हैं ।
जिनको दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम की लगन लग जाती है उनकी आखों से आंसुओं की धारा बहती है और वे युगल छवि का निरंतर चिंतन करते हैं ।
हे मित्र! मेरे समान कुटिल एवं खल कौन होगा जो युगल वर श्री राधा कृष्ण की कथा श्रवण कर नैनों से आंसुओं का प्रवाह भी नहीं बहाता ।
हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो । मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए ।
जो बड़भागी जन श्री वृंदावन का रस चख लेता है उसे चौदह भवन एवं तीनों लोकों का सुख सपने में भी नहीं सुहाता ।