राग जिला

राग जिला काफी थाट से संबंधित है। इस राग द्वारा निर्मित वातावरण दोनों प्रकार के श्रृंगार (संयोग और वियोग) के लिए सबसे उपयुक्त है। राग जिला रात 9 बजे से 12 बजे के बीच गाया जाता है।

14 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

    हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।

  2. करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

    हे स्वामिनी! कृपा करके मुझे अपने निज धाम श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये। हे करुणामयी! क्या कारण है कि आपने मुझे अपनी स्मृति से विस्मृत कर दिया है? हा राधे! आपने मुझे अपने महल की टहल (सेवा) से क्यों वंचित कर दिया? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध बन पड़ा है जिसे आपने अपने हृदय में धारण कर लिया है?

  3. देहु निकुंज निवास स्वामिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

    हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।

  4. जानीजू अब जानी श्रीवन - श्री ललित माधुरी

    अब मुझे श्रीवृन्दावन जाना है। हे वृन्दावन की रानी! मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि केवल आप ही मुझे वृन्दावन-वास प्रदान कर सकती हैं। मुझ पर अब कृपा करके श्रीधाम वृन्दावन का वास दें। यदि मैंने, आपकी दासी ने, कभी भी आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो, तो कृपया उसे अपने हृदय में स्थान न दें।

  5. श्री वृंदावन ध्याना हेली - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (35)

    हे सखी, अब तो श्री वृंदावन का ही अनन्य चिंतन करना है क्योंकि अब मुझे दिव्य युगल गौर श्यामल वर्ण के प्रिया प्रियतम के चरणों में ही अनन्य रूप से प्रेम बढ़ाना है ।

  6. सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)

    आज मार्ग में मैंने देखा की श्री राधा कृष्ण कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है, जो मेरे ह्रदय को बहुत भाति है ।

  7. एक नहीं मानेंगे अब हम वृन्दावन जावेंगे - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (289)

    हम एक भी नहीं मानेंगे अब अब वृंदावन जाएंगे। जो भी रूखा, सूखा, या फिर घी में चुपड़ा हुआ मिलेगा वह खा कर ही गुजारा करेंगे ।

  8. मनमोहन जाकी दृष्टि परत - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (5)

    श्री नारायण स्वामी कहते हैं "जिसे एक बार श्री कृष्ण की झलक मिल जाये, तो उसके ह्रदय की दशा बड़ी विचित्र हो जाती है। तब उसे उसका भवन नहीं सुहाता, न उसे भोजन ही अच्छा लगता है न सुन्दर वस्त्र, उसका मन दौड़-दौड़ कर वृन्दावन की ओर ही जाता है।"

  9. वृदावनको जाना हेली वृदावन को जाना है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (288)

    यह पद श्री ललित किशोरी जी ने वृन्दावन आगमन से पूर्व लिखा था जिसमें वह कहते हैं कि, हे सखी, मुझे तो अब केवल वृन्दावन जाना है। रसिक रंगीली जोड़ी श्री राधा कृष्ण को ही अनन्य रूप से ह्रदय समर्पित करना है।"

  10. श्री वृंदावनरज दरसावै सोई - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२१)

    जो हमें श्री वृंदावन रज एवं वृंदावन का मार्ग दिखाए वही हमारा सच्चा हितैषी है । जो हमारे हृदय में श्री राधा मोहन की छवि को छका दे वही हमारा सच्चा प्रियतम है ।

  11. जब श्रीवनवास मिलो सजनी तब तीरथ आन गए न गए - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (233)

    यदि श्रीवृन्दावन में वास मिल गया, तब अन्य तीर्थों पर जाने की आवश्यकता नहीं रही। यदि लाड़लीलाल का नाम ले लिया, तब किसी और नाम को लेने की जरूरत नहीं रही।

  12. श्री वृन्दावन वास दीजिये अब यही हमारी आशा है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (22)

    हे राधे! हमें श्रीवृन्दावन का वास प्रदान करें। यही हमारी एकमात्र अभिलाषा है—जहाँ यमुना का सुरम्य तट और रसिकजन का आनंदमय संग है।