हरि हरि जप लेनी औसर बीतो जाय - श्री सहजोबाई
सहजोबाई कहती हैं कि हे मूर्ख! समय बीतता जा रहा है, इसलिए अवसर रहते 'हरि-हरि' नाम का जप कर लो। अपने मन को एकाग्र कर इस बात पर विचार करो कि जो दिन एक बार बीत गए, वे फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे।
राग काफ़ी रात के दूसरे प्रहर में गाया जाता है। यह शृंगार रस का राग है।
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सहजोबाई कहती हैं कि हे मूर्ख! समय बीतता जा रहा है, इसलिए अवसर रहते 'हरि-हरि' नाम का जप कर लो। अपने मन को एकाग्र कर इस बात पर विचार करो कि जो दिन एक बार बीत गए, वे फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे।
नन्दनन्दन, श्री कृष्ण के मुकुट की शोभा पर न्योछावर हूँ। समस्त सखियों के बीच श्री हरि इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, जैसे नक्षत्रों के मध्य चन्द्रमा विराजमान हों।
हे श्रीवृषभानु-नन्दिनी श्री राधा! मेरी इस करुण विनय को कृपापूर्वक स्वीकार कीजिए। हे प्रियतम (श्रीकृष्ण) के प्राणाधार स्वरूपा स्वामिनी! अपनी करुणा-दृष्टि से मुझे अनुग्रहित कर अपने दिव्य एवं मनोहर स्वरूप का दर्शन प्रदान करें।
हे श्यामा जू, मुझे केवल आपके श्री चरण-कमलों का ही आसरा है। इसी कारण अब मैं निश्चिन्त हूँ, जन्म-मरण का अब कोई भय नहीं।
आज ललित त्रिभंगी लाल श्री कृष्ण श्री राधा को झूला झुला रहे हैं । श्री राधा के अंग स्वाभाविक श्रृंगार से केसरी रंग से रंगे चमक रहे हैं, और देह पर पंचरंगी साड़ी सजी है। [1]
हे राधा रानी! कृपा करके शीघ्र मुझे वृंदावन में वास दीजिए — राधाकुंड के मनोहर निकुंजों में, जहाँ मधुर-मधुर लीलाएँ होती हैं, जहाँ आप दोनों को सुख मिलता है ।
मैं निरंतर श्री वृन्दावन में निवास करूँ, यही मेरे चित्त की अभिलाषा है
हे सखी, मेरे मन ने सांवरे सलोने कृष्ण चन्द्र से प्रीति जोड़ ली है। अब मैं कुल की मर्यादा का पालन न करने के कलंक से नहीं डरूंगी, जो अब मेरा मन कहेगा, वही करूँगी।
युगल किशोर श्री राधा कृष्ण होली खेल रहे हैं। उनकी सुन्दर शोभा को देखते ही बनता है, जो नित्य नविन रंगों की वर्षा कर रहे हैं।
यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो।
हे श्री श्यामा जू, आपके चरण कमल ही मेरे लिए एकमात्र आश्रय हैं । इसी आश्रय से अब मैं निश्चिन्त रहता हूँ, मुझे अब जन्म-मृत्यु का भी भय नहीं है ।
यह नैना श्री श्यामसुन्दर का एक बार ही रूप निहार कर नित्य रिझवार हो गये हैं जिसका ऐसा प्रभाव पड़ा है कि घर बार का स्वतः ही त्याग होगया और एक फ़क़ीर बन गये हैं ।
हे बाँके बिहारी लाल, तुम्हारे नैन जादु भरे हैं जो ऐसा मोहिनी मंत्र डाल देती हैं कि जिसकी चितवन की कोर ही हमारे चित्त को वश में कर लेती है ।
यदि किसी वन में बसो हो तो वृंदावन में बसो, यदि गाँव में बसो तो नंद गाँव । यदि नगर में बसना हो तो मधुपुरी (मथुरा) और यदि तट पर विश्राम करना हो तो यमुना तट पर विश्राम करो ।
श्री नारायण स्वामी कहते हैं "सांवरे श्री कृष्ण से मुझे प्रेम हो गया है। अब मैं अपने कुल अथवा कलंक से नहीं डरूंगी, अपने मनका ही करुँगी।"
अरे मूर्ख, यदि तुमने हमारी श्री राधा रानी की शरण नहीं ली और उनके चरणों की रज को त्याग दिया, तो योग, यज्ञ, तप, साधना आदि से क्या आशा रखते हो?
अरे मन, अब तू जाग जा, नहीं तो तू बहुत पछतायगा। तुझे जिसको भजना चाहिए, उनको तूने भुलाया हुआ है । अत्यंत कृपालु श्री कृष्ण का नित्य भजन कर, केवल वही तुझे पार लगा सकते हैं ।
भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूपी अद्भुत रत्न प्रकट किया है।
श्री राधा मेरी आंखों में हैं, श्री राधा मेरी बोलनी में हैं, श्री राधा मेरे इशारों में हैं और केवल श्री राधा ही मेरी करनी में है। श्री राधा मेरे कानों में हैं, श्री राधा मेरे गायन में हैं, श्री राधा मेरी चेतना में हैं, केवल श्री राधा ही मेरा हित हैं - श्री ललित किशोरी|