बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
राग कालिंगडा रात्री के अंतिम प्रहर में गाया जाता है। (रात ३ बजे से सुबह ६ बजे के बिच)
13 संकीर्तन उपलब्ध हैं
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं।
हे कुंजबिहारी! मुझे नहीं पता कि श्री वृषभानु की चंद्रमुखी पुत्री, श्री राधा, तुमसे किस कारण रूठ गई हैं।
हे मन! क्यों इस सांसारिक धूल को चाट रहा है । यह धन एवं यौवन तो कपूर की भाँति क्षणिक है ।
अरी रसना “राधे राधे” बोल, जो समस्त शास्त्रों का सार, परम मधुर एवं अनमोल नाम है।
अरे मन, नमक हरामी मत कर । अरे दुष्ट, समस्त प्रकार का आलस त्याग कर प्रिया प्रियतम के निकुंज द्वार की ही नित्य सेवा कर ।
हे मन, इस कलिकाल का वास्तविक धन यही है कि युगल लाल के नाम का भजन कर । तू अन्य कहाँ भटकता हुआ फिर रहा है अब तू केवल श्री वृंदावन का वास कर ।
हे जीव, जिनका न कोई आदि है और न ही अंत, जो समस्त शास्त्रों वेदों के सार स्वरूप हैं, ऐसे गोविंद [भगवान कृष्ण] का भजन कर जिन्हें सुर, नर, मुनि एवं भगवान ब्रह्मा भी भजते हैं।
श्री आनंदघन कह रहे है "श्री धाम वृन्दावन, जो सजल है, सघन है, श्री श्यामसुंदर के प्रेम का बाग है, मुझे अति प्रिय है। श्री यमुना के किनारे श्री श्यामसुंदर का विचरण देख ह्रदय बिंध जाता है।" श्री आनंदघन कह रहे है "श्री श्यामसुंदर की मुरली की मधुर धुन सुनकर कोकिला अलाप ले रही है।"
इस पद में श्री नारायण स्वामी जी ने श्री युगल सरकार के अत्यंत मनोहर रूप का वर्णन किया है । वह कहते हैं कि, अरे मन तू श्री राधा कृष्ण का भजन कर, जिनके गोल गाल हैं, होंठ मीठे फल के जैसे एवं नयन अत्यंत विशाल हैं ।
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, "हे मेरे मन! तू केवल श्री कुंजबिहारी की महिमा का स्मरण कर। जो समस्त सुखों के सागर हैं, जिनकी झलक सारे ब्रह्मांड में दीप्तिमान है, जो हमेशा श्रीराधा जी के साथ रहते है। जो चारों भुजाएँ(प्रिया प्रियतम की बाहें) वृन्दावन रूपी नव नित्य नवीन निकुंज में हमेशा केलि (लीला) करते रहते है। श्री बिहारी बिहारिन जी, जो जीवन प्राण है उनको लाड लड़ा ।"
अरे मन, युगल सरकार के कमल चरणों से प्रेम करो। तुम अनंत काल से अज्ञानता में सो रहे हो। हे मूर्ख, यह जागने का समय है। जो तेरी भक्ति के पक्ष में एवं उसमें बाधा पहुँचाने वाले हैं, उनसे किसी भी तरह दूर भाग जा। वृंदावन का आश्रय ले, श्री युगल सरकार का भजन कर और भूल कर भी अन्य जगह मन का लगाव न कर ।
श्री वृन्दावन में निवास करना अत्यंत सुंदर है। प्रत्येक क्षण श्री बिहारीजी के दर्शन से प्रेम निरंतर बढ़ता रहता है।