लागो कृष्ण-चरन मन मेरौ [1] - रूप कुँवरि जी
मेरा मन श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हो गया है।
राग पीलू काफी थाट से सम्बंधित है। इस राग का भाव सूक्ष्म है और इसलिए यह राग ठुमरी और भजनों के लिए उपयुक्त है। यह राग भक्ति से परिपूर्ण है। राग पीलू दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक गाया जाता है।
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मेरा मन श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हो गया है।
साधक को भगवान से विमुख (अधर्मी) जीवों का संग छोड़ने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गए शब्द तीखे बाणों के समान हृदय को छलनी कर देते हैं। उनके साथ अनजाने में होने वाले मिलन, दर्शन अथवा स्पर्श से भी सर्वथा भयभीत रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा असत्-संग भगवद-प्राप्ति के मार्ग में निश्चित ही एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है।
हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।
अब तो मुझे ब्रज की दिव्य लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। गिरिराज जी की पावन गोद में वास करना ही जीवन की परम सिद्धि प्रतीत होती है।
हे श्यामा (राधा), अब मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। आपकी याद मुझे हर क्षण सताती रहती है एवं आपकी नित्य स्थली सेवाकुंज मेरे हृदय को अत्यंत मनोहर लगती है।
भगवान के भजन के बिना यह शरीर व्यर्थ है जो मल-मूत्र से भरा है और भक्ति न करने पर यह चाम (चमड़ी का पुतला) भी निष्फल हो जाता है।
हे प्यारे कृष्ण, मेरे ह्रदय मंदिर में आओ, मैं तुम्हें अपनी पलकों की ओट में रखूँगी।
हे सखी, ऑंखें भरकर श्री प्यारी जू की अनुपम छवि को देखो। सुन्दर कुञ्ज में वनमाली श्री कृष्ण वृषभानु सुता श्री राधा के संग सुशोभित हैं।
श्री राधारानी सखी से कहतीं हैं कि हे सखी, देखना नन्दलाल (श्री कृष्ण) आने न पायें । चाहे जितना तुम्हें अनुनय-विनय करें लेकिन मेरे महल के भीतर चरण रखने नहीं देना ।
हे किशोरी श्री राधा, हे सुंदरी श्यामा, तुम ही एक मात्र मेरी सरकार हो । मुझे अन्य किसी से कोई मतलब नहीं है, केवल एक तुम्हारी ही मुझे आस है ।
हे किशोरी जी, मुझे आप कब अपनाओगी ? कब आप अपने कमल हस्त को मेरे मस्तक पर रख कर मुझे वृंदावन का वास प्रदान करोगी ।
श्री किशोरी अली जी श्री राधा से प्रार्थना करते हैं "हे लाड़िली ! मुझे कब अपनी सेवा का सुख प्रदान करोगी। अपना हस्त कमल मेरे मस्तक पर रखकर मुझे कब श्री वृन्दावन का वास प्रदान करोगी।"
अरी सखी, श्याम श्याम रटते रटते श्यामा जू [श्री राधा] स्वयं श्याम बन गयी एवं सखियों से पूछने लगी की श्यामा [राधा] कहाँ हैं?
संसार में श्रीराधा जैसी भाग्यवान कोई स्त्री नहीं है। जिनके पति तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण सदैव उनके कन्धे पर गलबहियां डाले रहते हैं।