राग पूरवी
राग पूरवी को सूर्यास्त के समय गाया जाता है। यह विरह योग का राग है।
15 संकीर्तन उपलब्ध हैं
मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)
प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।
पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)
ललिता पीछे-पीछे चल रही हैं, उनके आगे प्यारी श्यामा (राधा) जू हैं, और उनसे आगे प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में फूल बिछाते हुए चल रहे हैं।
ए दोउ राजत रंग भरे री - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166)
युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं।
मेरौ मन गिरिधर-छबि पै अटक्यो - श्री कृष्णदास जी
मेरा मन गिरिधर श्रीकृष्ण की अद्भुत छवि पर अटक गया है। उनकी ललित त्रिभंगी सुंदर छवि पर पहुँचकर मेरा मन ठहर गया है !
लड़ैती मैं सब भाँति तिहारो - श्री संकेत अली, संकेत लता (64)
हे राधे! मैं हर प्रकार से केवल आपकी ही हूँ। जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही मेरे मन के लिए आपकी छविनिधि ही जीवनदायिनी है।
आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (115)
श्री कृष्ण आगे हैं, श्री कृष्ण पीछे हैं, श्री कृष्ण इधर हैं, श्री कृष्ण उधर हैं, जहाँ भी मैं देखता हूँ, वहाँ केवल श्री कृष्ण ही दिखते हैं।
प्यारी कृपा लाल उर जानी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (104)
प्यारी (श्री राधा) की कृपा को लालजी (श्री कृष्ण) ही ह्रदय से जानते हैं। इसीलिए वे सदैव श्री राधा के चरण कमलों में बिके से रहते हैं, सदैव उनकी अगवानी करते रहते हैं।
नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)
प्रेम के मार्ग की गति ही न्यारी है । जो भी इस मार्ग का पथिक है उसे अंधा होकर ही चलना होता है (अर्थात् यहाँ आत्मसमर्पण कर चला जाता है और प्रेमास्पद के बाह्य गुण एवं दोष को नहीं देखा जाता) तभी उसे वस्तु की प्राप्ति हो सकती है ।
मो मन गिरधर छबि पै अटक्यो - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1090)
"मेरा हृदय गिरधर श्री कृष्ण की सुन्दर छवि पर अटका हुआ है। उनकी ललित त्रिभंग मनमोहक चाल एवं उनका सुन्दर चिबुक मेरे ह्रदय में बस गए हैं । [1]
आजु प्यारी के संगि रसिक राइ गुपाल - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (17)
आज श्री गोपाल के संग प्यारी राधिका की छवि अत्यंत मनोहर लग रही है । वे दोनों मधुर गान करते हुए आ रहे हैं एवं उनकी चाल मराल के समान है ।
आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (187)
श्री कुम्भनदास जी सखी भाव में भावाविष्ट कह रहे हैं "मनमोहन श्री कृष्ण जब संध्या समय गायों के साथ लौटते हैं तब उनकी सुन्दर छवि मेरे मन का हरण कर लेती है। मैं तो अपने घर में बैठी थी लेकिन श्री कृष्ण का दर्शन करते ही मैं सुध-बुध खो बैठी तथा अपने सर पर ओढ़नी रखना भी भूल गयी।"
यह अभिलाष लडैती मोरी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (179)
हे राधारानी, मेरी यही अभिलाषा है की आप लाल जी [श्री कृष्ण] संग मुदित [प्रसन्न चित्त] विराजें और मैं आपको चकोर पक्षी जिस प्रकार चन्द्रमा को निहारता है वैसे ही एकटुक निहारूँ ।
रहै दोऊ बदन निहार निहार - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (41)
श्री नागरीदास कहते हैं, "रमणीक श्री वृन्दावन मे श्री श्यामसुंदर अपने सखाओं के संग पुष्प चयन कर रहे हैं एवं उसी समय वहाँ अति सुकुमार श्री श्यामा जू आ गईं और जब दोनों ने एक दूसरे को देखा, तो बस देखते ही रह गए।"
राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "राधा राधा रटते रटते मेरी रसना रसीली बन गयी है, एवं जितना अधिक इस अद्भुत रस का पान करता हूँ, उतनी ही अधिक नवीन प्यास प्रकट हो रही है ।
रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया - श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ 6 (3)
रसिक वर प्रियतम बड़े ही रसीले रसिया हैं। इन्होंने प्रियतमा के नेत्रों में अंजन पूर कर उनके मन को अनुराग से ऐसा रँगा कि उनके खंजन-जैसे (विशाल और चंचल) नयनों के सौन्दर्य में स्वयं ही फँस गये।