राग विहाग

राग विहाग या राग विहागरो ठाट बिलावल से संबंधित है जिसे रात्रि के दूसरे प्रहार में गाया जाता है।

112 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  2. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  3. सनेही एक विहारी-विहारिनि एक - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)

    परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।

  4. सुख निधि श्री गिरिराज तरहटी - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    श्री गिरिराज जी की तलहटी समस्त सुखों की निधि (खजाना) है, जहाँ के विभिन्न कुंडों के जल का आचमन करके और उसमें स्नान करके, भक्त बार-बार व्रज-रज में लोटकर आनन्द का अनुभव करते हैं।

  5. हरि-मुख राधा-राधा बानी - श्री सूरदास, सूरसागर (3377)

    श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं।

  6. आज सखि निरख रूप भरि नैन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)

    हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं।

  7. प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (15)

    श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ।

  8. चले पिय भाँवती रस लेन - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।

  9. प्रिया पिय छबि लखि छकनि छकाई - श्री सरसमाधुरी

    प्रिया (राधा) और प्रियतम (कृष्ण) एक-दूसरे की छवि को निहारकर प्रेम में पूर्ण-रूपेण छके हुए हैं। वे दोनों परस्पर होली के खेल में मग्न हैं और उनका तन-मन इस दिव्य उत्सव के रस में डूबकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है।

  10. लाडिली विनय सुनो सुख रासी - श्री सरस माधुरी जी

    हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं ।

  11. श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (77)

    श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है।

  12. निरतत रास में पीय-प्यारी - श्री विट्ठल दास

    श्रीधाम वृन्दावन की परम पावन भूमि पर, शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात्रि में, यमुना किनारे श्री राधा-कृष्ण (पिय-प्यारी) दिव्य रास में मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं।

  13. नवल लाल अरु नवल किसोरी - श्री राधा प्रसाद देव जू

    नित्य नव दूलह-दुलहिन-स्वरूप श्रीश्यामा-श्याम नव निकुंज मन्दिर में सुख-सेज पर पौढ़े हुए हैं। हे सखी, वे परस्पर हास-परिहास पूर्वक सुख विलसते हुए अतिशय शोभित हो रहे हैं।

  14. लगे जो श्री बल्लभ पद रंग - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    जो श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण अथवा श्री वल्लभाचार्य) के चरणकमलों के रंग में रंग जाता है, उसके हृदय में किसी भी प्रकार का कुसंग व्याप्त नहीं रहता। वह सहज ही संतों की संगति प्राप्त कर लेता है।