बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
राग विहाग या राग विहागरो ठाट बिलावल से संबंधित है जिसे रात्रि के दूसरे प्रहार में गाया जाता है।
112 संकीर्तन उपलब्ध हैं
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।
परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।
श्री गिरिराज जी की तलहटी समस्त सुखों की निधि (खजाना) है, जहाँ के विभिन्न कुंडों के जल का आचमन करके और उसमें स्नान करके, भक्त बार-बार व्रज-रज में लोटकर आनन्द का अनुभव करते हैं।
श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं।
हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ।
प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।
प्रिया (राधा) और प्रियतम (कृष्ण) एक-दूसरे की छवि को निहारकर प्रेम में पूर्ण-रूपेण छके हुए हैं। वे दोनों परस्पर होली के खेल में मग्न हैं और उनका तन-मन इस दिव्य उत्सव के रस में डूबकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है।
हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं ।
हे श्यामा जू, मुझे केवल आपके श्री चरण-कमलों का ही आसरा है। इसी कारण अब मैं निश्चिन्त हूँ, जन्म-मरण का अब कोई भय नहीं।
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ।
श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है।
श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें।
हे सखि ! हमारे युगल किशोर प्रेम की चरम सीमा हैं। इनका तन, मन और नेत्र — सब एक हो गए हैं, ये कभी एक-दूसरे से विलग नहीं होते।
श्रीधाम वृन्दावन की परम पावन भूमि पर, शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात्रि में, यमुना किनारे श्री राधा-कृष्ण (पिय-प्यारी) दिव्य रास में मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं।
अरे मन! श्यामसुन्दर से प्रेम के बंधन में जुड़ जा । “कृष्ण” नाम का घेरा अपने चारों ओर बना ले, और अपना जीवन रूपी खेत सुरक्षित कर ले ।
नित्य नव दूलह-दुलहिन-स्वरूप श्रीश्यामा-श्याम नव निकुंज मन्दिर में सुख-सेज पर पौढ़े हुए हैं। हे सखी, वे परस्पर हास-परिहास पूर्वक सुख विलसते हुए अतिशय शोभित हो रहे हैं।
हे सखी! सुनो हम केवल ब्रज में ही सदा वास करेंगें । वहाँ अपने हृदय की पीड़ा को कुंजों के हर पत्ते एवं हर लता से कहेंगें।
जो श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण अथवा श्री वल्लभाचार्य) के चरणकमलों के रंग में रंग जाता है, उसके हृदय में किसी भी प्रकार का कुसंग व्याप्त नहीं रहता। वह सहज ही संतों की संगति प्राप्त कर लेता है।