अनन्यनि कौनकी परवाहि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)
श्री राधा कृष्ण के अनन्य रसिकों को किसी की परवाह नहीं होती । वे तो कंधे पर कंबल एवं हाथ में करुवा लिए, नित्य श्री कुञ्जबिहारी की ही अनन्य आशा बनाये रखते हैं ।
जीव की भक्ति चरम सीमा पर तभी पहुँचती है जब उसे अपने इष्टदेव पर अनन्य आश्रय होता है।
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श्री राधा कृष्ण के अनन्य रसिकों को किसी की परवाह नहीं होती । वे तो कंधे पर कंबल एवं हाथ में करुवा लिए, नित्य श्री कुञ्जबिहारी की ही अनन्य आशा बनाये रखते हैं ।
हे स्वामिनीजू, मुझे कब आप अपनाओगी! हे श्री वृंदावन की महारानी, प्रीतम को सुख प्रदान करने वाली श्री राधे! कब मुझे अपनी राजधानी श्री धाम वृंदावन में वास प्रदान करोगी?
श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं । मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निवास करता ।
हे सखी, मैं श्री राधा की ही अनन्य दासी हूँ, मेरे मन में श्री राधा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा के निज जन की सब प्रकार से केवल श्री राधा ही हैं।
मेरे समान कोई पातकी नहीं और आपके समान कोई अधम उधार नहीं । हे रसिक क़ुंवरि श्री राधिके, कृपया आप वही कीजिए जिसके लिए आप ‘अधम उधारन’ जानी जाती हैं [अर्थात् मुझ जैसे पतित का कल्याण कीजिए जो आपकी शरण में आया है ] ।
यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जाए, ऐसा निकुंज मुझे एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं।
श्री वृंदावन वास की ही आशा निश दिन लगी रहे, बस एक यही उपाय विचारना चाहिए।
समस्त सहचरियाँ श्री राधा के चरणों की प्रेमपूर्वक सेवा करती हैं और मन, वचन, एवं कर्म से पूर्ण अनन्यता धारण कर उन्हीं चरणों में अपनी अटूट प्रीति रखती हैं।
श्री राधा के निज महल की सखियाँ, श्री राधा के निज महल के रस में ऐसी उन्मत्त रहती हैं कि उनके (श्री राधा के) अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं मानती । यह सखियाँ तो अलबेली (राधा जू) के नित्य ही संग में रहती हैं एवं उनके आभूषण, वस्त्र आदि की अंग सेवा करती रहती हैं ।
व्यासनंदन श्री हरिवंश जी ने श्री राधा को ही अपना गुरु बनाया, श्री “राधा राधा” नाम का ही मंत्र प्रेम पूर्वक जपा जिससे श्री राधा ने उन्हें दर्शन दिए।
हे सुख राशि लाड़ली [श्री राधे], आप ही बताओ, मेरे अवगुण तो कितने होंगे, परंतु आप तो अपार करुणा की समुद्र हो, अत: आप मेरे अवगुणों को न विचारते हुए मुझ पर अपनी कृपा बरसाइये ।
अपने सांसारिक घर की वासनाओं से मुख मोड़कर, भव के जाल (सांसारिक झंझटों) को तोड़कर, समस्त साधनों को त्याग कर, एक नंदलाल श्री कृष्ण का निष्काम एवं निष्कपट भाव से भजन करो।
हे ब्रज नागरी, परम चूड़ामणि रानी, सुख सागर एवं रस रास को बरसाने वाली स्वामिनी, श्री राधा ! ऐसी कृपा करो कि मेरे हंस रूपी मन को तुम अपने चरण रूपी पिंजरे में क़ैद करके रखो जिससे मेरा यह मन सदा प्रफुल्लित रहेगा ।
हम नित्य अपने में मस्त रहते हैं, न हमें लाभ की चिंता है और न ही हानि की।
हे मेरे मन, तू केवल अनन्य रूप से केवल श्री राधा महारानी का आश्रय ग्रहण कर जो समस्त बाधाओं का हरण करने वाली हैं ।
किसी को शेषनाग पर भरोसा है, कुछ को भगवान सूर्य पर भरोसा है। कुछ को भगवान शिव पर भरोसा है, जो वरदान देने के लिए प्रसिद्ध हैं।
हे रासेश्वरी राधे! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता।