श्री हरिव्यास देवाचार्य

श्री हरिव्यास देवाचार्य, वृंदावन के एक रसिक संत, निम्बार्क सम्प्रदाय के श्री भट देवाचार्य के शिष्य हैं। इन्होने महावाणी का प्राकट्य किया है जिसे रसोपासना का प्रमुख ग्रन्थ माना जाता है।

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  1. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  2. रहौ मेरे उर में ऐंन करि प्यारी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (69)

    हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।

  3. सुखकारी सबके सदा - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (146)

    नित्य-नवीन प्रेम से परिपूर्ण श्रीलाड़िलीलाल (श्रीराधा-कृष्ण) समस्त सखी-सहचरियों के प्राणों के आधार और जीवन-धन हैं। वे परम सुख प्रदान करने वाले हैं और सदैव अपने भक्तों के प्राणों की रक्षा करने वाले हैं।

  4. रसिकन के हित कारने - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (55)

    रसिक दम्पति की यह गौर-साँवरी जोड़ी रसिकों के हित के लिए अहर्निश नित्य विहार में लवलीन रहती है इसलिए इस जोड़ी जैसी उदारता और जोड़ियों में नहीं है।

  5. प्रिया बदन सुखमा सदन - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (05)

    श्री प्रिया जू का मुख कमल सुख का वह सदन है जो प्रेम से परिपूर्ण है, जिसमें प्रियतम के प्राण बसे हुए हैं। वही उनके प्राणों का आधार है।

  6. पराभक्ति रस वर्धिनी श्यामा सब सुख दैन - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (51)

    श्री श्यामा जू (श्री राधा) पराभक्ति दान करने वाली, रस को बढ़ाने वाली हैं तथा समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं। रसिकों के लिए वे ही परम शिरोमणि हैं। ऐसी नव कमल-सदृश नेत्रों वाली, श्री राधिका महारानी की जय हो।

  7. अरी मेरे नैननि को आहार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37)

    श्रीहरिप्रिया सखी कहती हैं — हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रीतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं।

  8. जय श्रीराधिका रसभरी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (32)

    रस से परिपूर्ण उन श्रीराधारानी की सदा जय हो, जो श्यामसुंदर के प्राणों की संजीवनी हैं । जिनकी कृपा से ही पूर्ण प्रेम प्रकाशित हुआ है और जो प्रेम समुद्र को परिपूर्ण करके उसमें स्वयं ही निमग्न हो गई हैं।

  9. सुनीहूँ न देखी ऐसी जोरि जुगल किसोर किसोरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (56)

    युगल किशोर की जैसी यह जोड़ी है ऐसी न तो कहीं सुनी न ही कहीं देखी। इनके अंग प्रत्यंगों की शोभा पर करोड़ों कामदेवों को न्यौछावर करके वार डालना दीजिये।

  10. करुणा सब दुख चूरणा - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (117)

    सर्व दुःखों का नाश करने वाली, श्रीकृष्ण के लिए परम सुखदायिनी, शरणागत-पालिका प्राणप्यारी, सुकुमारी श्री राधा किशोरी की सदा ही जय हो।

  11. पल बिछुरें न कल परें - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (37)

    सहज रंगीली साँवरी गोरी जोरी परम उदार है। ये दोनों इस प्रकार के रस में ढरे हुए हैं कि यदि ये एक पल के लिये भी बिछुर जाएँ तो इन्हें कल नहीं पड़ती है।

  12. भ्रमत रहत निसिदिन छिना - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (93)

    श्री कृष्ण कहते हैं कि हे राधे! मेरे नेत्र-रूपी भौंरे तुम्हारे कमल-रूपी चरणों के प्रेम-रस में ऐसे सराबोर रहते हैं कि ये भौंरे उन चरण-कमलों पर रात-दिन मंडराते रहते हैं।

  13. नीरजनैंनी नागरी कलबैंनी सुकुँवारि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (75)

    हे कमल-सरीखे नेत्रों वाली नागरी (श्री राधा)! हे मृदुभाषिणी सुकुमारी जू! आप श्रीहरि की अत्यंत प्यारी हैं। अतः आप उनके हृदय से लगकर उन्हें सुख प्रदान करें।

  14. करि कें आस जू और की तकत न इत उत होय - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (71)

    हे प्रिया जी (श्री राधा), मेरा मन केवल आपके चरणारविंदों की आशा को छोड़कर कहीं भी इधर-उधर नहीं भटकता है। मेरे मन को आपके चरणों की परछाईं के बिना और कुछ भी नहीं सुहाता।

  15. मनमोहन बसकारिनी नखसिख रूप रसाल - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (23)

    उन स्वामिनी जी, रसकिनी श्रीराधा के गुणों का नित्य गान कीजिए, जो श्री कृष्ण को वश करने वाली हैं और जिन का नख से शिख पर्यन्त रूप रस से भरा हुआ है।

  16. अहो बलि स्वामिनी सुखसार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (17)

    हे सुख-स्वरूपा स्वामिनी जू (श्री राधा)! जो कुछ प्रताप है, वह आपके इन युगल-चरणों का ही है। इसमें मेरा कोई उपकार (सामर्थ्य) नहीं है। आप केवल अपनी उदारता के कारण ही मुझे बढ़ाई दे रही हैं।

  17. प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (98)

    श्रीलाल जू अत्यन्त प्रसन्न होकर श्री स्वामिनीजू के चरणारविन्दों को पकड़ कर कहते हैं - हे सुख की निधान श्रीस्वामिनी जू ! आपके बिना इस मर्म को कौन समझ सकता है।

  18. जुगलवर को यह सुरत बिहार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (100)

    जो कोई अधिकारी इस “सुरत-सुख” का स्मरण करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम रीझ जाते हैं और उसे सुरत-सुख से उत्पन्न अति दुर्लभ उस काम-रस सुख को प्रदान करते हैं, जो रस-विधि और प्रेम-लक्षणा भक्ति से भी परे है।

  19. कृष्णरूप श्रीराधिका, राधे रूप श्रीस्याम - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (77)

    श्री राधिका कृष्ण-रूप हैं और श्री श्यामसुंदर श्री राधा-रूपा हैं। ये दोनों दर्शन-मात्र को तो दो हैं, परंतु तत्त्वतः ये दोनों सुख-धाम एक ही हैं।