पद रत्नाकर
पद रत्नाकर भाईजी द्वारा लिखे गए सभी भक्ति गीतों का एक काव्य संग्रह है। इसमें श्री राधा कृष्ण की दिव्य लीलाओं के पदों का संकलन हैं।
33 लेख उपलब्ध हैं
परम प्रेम-आनंदमय - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (189.1)
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) परम प्रेम और आनंद से परिपूर्ण हैं, साक्षात् रस का ही स्वरूप हैं। वे श्री धाम वृन्दावन में यमुना के पावन तट पर, कदम्ब के वृक्ष के नीचे विहार करते हैं, जिसकी शोभा अलौकिक, अगाध और अनिर्वचनीय है।
करौ कृपा श्रीराधिका- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (15.1)
हे श्रीराधिका, मुझ पर कृपा कीजिए! मैं बार-बार यही विनती करता हूँ कि आपकी मधुर और परम पवित्र स्मृति सदा बनी रहे, जो मंगलमय और समस्त सुखों का सार है।
परयो रहौं नित चरण-तल- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.5)
हे युगल सरकार, मेरे श्री राधा माधव! मैं सदा तुम्हारे चरण-तल में पड़ी रहूँ और प्रतिदिन उनकी रज का स्पर्श करती रहूँ। चरण-दासी बनकर तुम्हारी चरण सेवा करती रहूँ, अन्य सबको भुला दूँ।
मोच्छहु की माया मिटै - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.2)
मोक्ष आदि की लालसा ह्रदय से मिट जाये एवं समस्त भव रोगों का नाश हो जाय। हे श्यामा श्याम, मेरी यही इच्छा है कि तुम दोनों के चरणों का संयोग सदा बना रहे।
नित्य छबीली राधिका - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (189.4)
श्री राधिका नित्य छबीली हैं, और ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण नित्य छविमय हैं, दोनों श्री वृंदावन धाम में स्वच्छंद रूप से लीला विहार में निमग्न हैं।
जो कछु तुम चाहौ, करौ राधा-माधव! दोउ - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.3)
हे श्री राधा-माधव! आप दोनों युगल सरकार जो कुछ भी चाहें, वही करें। मेरी बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि जो आपके मन की स्वाभाविक रुचि और इच्छा हो, वही मेरी भी चाह बन जाए (अर्थात् तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा हो जाए )।
ऐसी जो प्रियतमा श्यामकी, त्याग-मूर्ति, गुणवती उदार - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (3)
जो त्याग की प्रतिमूर्ति, गुणों की पराकाष्ठा और उदारता की सीमा हैं तथा श्री श्यामसुंदर की परम प्रियतमा हैं, उन श्री राधा के चरण-कमलों में मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।
जिन श्रीराधा के करैं नित श्रीहरि गुन गान - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (12)
जिन श्री राधा का श्री कृष्ण नित्य गुण-गान करते हैं, उन्हीं श्री राधा के प्रेम रस में रसखान श्री कृष्ण लोभी बने रहते हैं ।
जयति निकुंजबिहारिनी, हरनि स्याम संताप - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (9.2)
निकुञ्ज में विहार करने वाली श्री राधा रानी की जय हो, जो श्यामसुंदर के हृदय के समस्त संताप और ताप को हर लेने वाली हैं। जिनकी श्रीअंग की छाया मात्र से कामदेव के मन का सारा अभिमान और दर्प तत्क्षण नष्ट हो जाता है।
जिह्वा के मम अग्रभाग पर रहे विराजित राधा नाम - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, पद-रत्नाकर (545)
मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सदा “श्रीराधा” नाम विराजमान रहे ।
सहज दयामयि राधिका - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (12.5)
श्री राधिका स्वभाव से ही अत्यंत दयालु हैं, वे मुझ पर अपनी महान कृपा बनाए रखें। मेरी यही अभिलाषा है कि वे मुझ जैसे अधम (पतित) जीव को सदैव अपनी पावन चरण-रज का दान प्रदान करती रहें।
राधाजू ! मोपै आजु ढरौ - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (17)
हे श्री राधा, आज मुझपर अपनी करुणा दृष्टि कीजिये । अपनी एवं अपने (निज) प्रियतम श्री कृष्ण की चरण रज की रति मुझे प्रदान कीजिये ।
बंदौं राधा-पद-रज पावन - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (10)
श्री राधा की पावन पद रज का मैं वंदन करता हूँ जो नित्य ही श्री श्यामसुंदर द्वारा सेवित है, परम पुण्यमय है एवं तीन प्रकार के तापों का विनाश करने वाली है ।
बन्दौ राधा पद कमल अमल सकल सुख धाम - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (8.1)
मैं नित्य श्री राधा के अमल चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ, जो समस्त सुखों के धाम हैं। उन चरणों का प्रेमपूर्वक स्पर्श करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी सदा लालायित रहते हैं।
श्रीराधा ! अब देहु मोहि तव पद रज अनुराग - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.1)
हे श्री राधा! ऐसी कृपा कीजिए कि मेरे हृदय में आपके श्रीचरणों की रज के प्रति सच्चा अनुराग उत्पन्न हो जाए। तब इस मिथ्या संसार के भोगों के प्रति स्वतः ही वैराग्य जागृत हो जाएगा।
जयति स्याम-स्वामिनि परम निरमल रस की खान - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (8.2)
श्री श्यामसुंदर की स्वामिनि श्री राधा की जय हो, जो निर्मल रस की खान हैं और जिनके चरण कमलों पर प्रेम-निधान श्री कृष्ण नित्य ही स्वयं को न्यौछावर करते हैं।
रसिक श्याम की जो सदा - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (9.1)
श्री राधारानी के चरण-कमल, जो रसिक-शेखर श्रीकृष्ण के जीवन-मूल हैं, मैं सदा उनकी रज की वंदना करता हूँ।
बन्दौ राधा पद कमल अमल सकल सुख धाम
मैं नित्य ही श्री राधा चरण कमल का वंदन करता हूँ जो अमल हैं एवं समस्त सुखों के धाम हैं।
दोउ चकोर दोउ चंद्रमा - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (1.1)
श्री श्यामा-श्याम दोनों ही चकोर भी हैं और चन्द्रमा भी; दोनों ही कमल-पुष्प भी हैं और भ्रमर भी; दोनों ही चातक-पक्षी भी हैं और मेघ भी; दोनों ही मछली भी हैं और जल भी।
तुम दोउन के चरण कौ बन्यौ रहै संयोग - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.2)
हे प्रिया-प्रियतम! मेरे लिए तो बस आप दोनों के चरणों का सान्निध्य बना रहे, यही मेरी एकमात्र कामना है। हे राधा माधव! इसके अतिरिक्त आप जो चाहें सो करें, मैं आपकी हर इच्छा में सुखी हूँ।