मेरै सरवस धन तुमहिं - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)
हे मेरे प्राणों की वल्लभा श्री राधे! आप ही मेरा सर्वस्व और एकमात्र धन हैं। आप ही मेरी रति (प्रेम), मेरी बुद्धि, मेरी परम गति, मेरी रक्षक (स्वामिनी) और पालनकर्ती हैं।
श्री रूपरसिक देवाचार्य, वृंदावन के एक रसिक संत, जिन्हें निम्बार्क संप्रदाय के श्री हरिव्यास देवाचार्य का शिष्य माना जाता है।
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हे मेरे प्राणों की वल्लभा श्री राधे! आप ही मेरा सर्वस्व और एकमात्र धन हैं। आप ही मेरी रति (प्रेम), मेरी बुद्धि, मेरी परम गति, मेरी रक्षक (स्वामिनी) और पालनकर्ती हैं।
परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।
रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित्य विहार करते हैं।
श्री राधा के इस अद्भुत प्रेम की गति को देखो, जो वर्णनातीत है। सम्पूर्ण जग भगवान श्री कृष्ण के अधीन है, परंतु वे स्वयं श्री राधा के अधीन हैं।
लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।
हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है?
बार-बार श्रीवृंदावन धाम की इस धरा को प्रणाम है जिसमें प्रिया-प्रियतम का सुहाग सदा अविचल बना रहता है अर्थात् युगल रस माधुरी की अखंड धारा प्रवाहित होती रहती है ।
वही वास्तविक रसिक अनन्य कहलाता है जिसके श्रवणेंद्रिय को युगल (श्री राधा कृष्ण) की रस लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता।
मेरी आँखें ऐसी लालची हो गई हैं कि लोक-लाज और कुल-मान की परवाह छोड़कर केवल श्रीलालविहारी (श्री कृष्ण) के दर्शन में ही तल्लीन रहती हैं।
जो अपनी प्रशंसा सुनकर कभी अहंकार से फूलता नहीं और निंदा सुनकर तनिक भी क्रोधित या खिन्न नहीं होता, वही आनंदस्वरूप संत कहलाने का सच्चा अधिकारी होता है।
एक बार उनको निहारो; यदि तुम प्रेम की सच्ची ग्राहक हो, तो जान लो मोहन वही हैं जो हर हृदय को रिझा लेते हैं।
श्रीधाम वृन्दावन में जो युगल ने लीला की है, वही रसिकों का प्राण-जीवन और परम धन है। कहने को ये दो हैं—“राधे” और “श्याम”—परंतु वस्तुतः इनका प्राण एक ही है। अथवा यूँ कहें कि इन दोनों से प्रकट हुआ नित्य-विहार-रस वस्तुतः एक ही है।
वास्तविक रस में रमे भजनानंदी रसिक का मिलना इस संसार में परम दुर्लभ है। अधिकांश लोग रस की चर्चा तो करते हैं, परंतु केवल बाह्याचार में ही उलझे रहते हैं। बाहरी तौर से वे भले ही स्वयं को रसिक दिखावें, परंतु भीतर से वे नीरस होते हैं—केवल रीति-रिवाज, विधि-विधान में ही फँसे रहते हैं।
हे सखी! देखो तो सही, यह स्वरूप तो स्वयं सौंदर्य की पराकाष्ठा है। यमुना के तट पर, कदम्ब वृक्ष की शीतल छाया में श्री श्यामाश्याम गलबहियाँ डाले खड़े हैं।
अवध आदि श्री हरि के जितने भी धाम हैं, उनका फल वैकुंठ धाम की प्राप्ति है। ऐसे अनंत कोटि वैकुंठ धामों को श्री वृन्दावन धाम की रज के ऊपर वार देना चाहिए।
निज महल रूपी श्री वृंदावन धाम का रस समस्त सारों का भी सार रस है। जो इस रस का आस्वादन करते हैं उन पर श्री राधा की अहेतुकी कृपा बरस रही है।
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण का यह बसंतोत्सव अब अतिशय मनमोहक और हृदय को आल्हादित करने वाला प्रतीत होता है।
समस्त लोकों के मुकुटमणि, श्री वृंदावन निज धाम को कोटि-कोटि वंदन है, जहाँ नित्य किशोर युगल सरकार, श्री राधा-कृष्ण, सदा वास करते हैं।
श्री वृंदावन धाम की जय हो जो युगल (श्री राधा कृष्ण) की केली लीलाओं का घर है जिसकी महिमा का वर्णन करने में हजारों वेद भी असमर्थ हैं।
श्री श्यामा श्याम उदार निज वृंदावन धाम में नित्य विहार पारायण हैं, जो अरबों-खरबों वैकुंठ धामों के गर्व को भी मिटाने वाला है।