सिद्धान्त की साखी [श्री चतुर दास जी की वाणी]

सिद्धान्त की साखी, ग्रंथ श्री चतुर दास जी की वाणी में श्री चतुर दास जी द्वारा लिखित सिद्धांत के दोहों का संकलन है । रचैयता: श्री चतुर दास जी

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. ललितमोहिनी कृपा करी - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (13)

    श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उनके गुरुदेव श्री ललित मोहिनीदास जी की कृपा से, वे नित्य विहार पारायण श्यामा कुंजबिहारी को निरखते हैं । समस्त सांसारिक द्वन्दों को त्याग कर, श्री वृंदावन धाम का आश्रय ग्रहण कर, अनन्य भजन करना ही इसका एक मात्र उपाय है ।

  2. श्रीस्वामी हरिदास भजि, सिद्ध होइ सब काम - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (11)

    श्री चतुरदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते हैं, “हे मन, तुम श्री स्वामी हरिदास जी महाराज का भजन करो (अर्थात् अखंड नित्य विहार उपासना करो), जिससे समस्त इच्छाएँ स्वतः ही पूर्ण हो जाएँगी एवं निश्चित ही श्यामा कुंजबिहारी का अवलोकन प्राप्त होता है।”

  3. जा सुख नैना सुख ढके - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (7)

    जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है । सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।

  4. श्रीस्वामी हरिदास भज - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (10)

    श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर । यह संसार तो सपने जैसा झूठा है, इसके चक्कर में मत पड़ क्योंकि यहाँ सुख शांति का लवलेश भी नहीं है ।

  5. सो सुख वृन्दाविपिन है मूल आदिद्रुम जैस - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (6)

    संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है । श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम कुंजबिहारी के रूप में देखती हैं ।

  6. श्री स्वामी हरिदास भजो मन, श्री हरिदास भजौ - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (9)

    श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर । दूसरों के अवगुणों का क्या चिंतन करते हो, देखना है तो अपने अवगुणों को देखो, तुम्हें स्वयं को शर्म आजाएगी ।

  7. सुरति समानी रूप में - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (8)

    प्रेम साक्षात रूप में समाहित है और रूप प्रेम में; दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः ओतप्रोत हैं। श्रीचतुरदास जी कहते हैं कि रूप और प्रेम की पराकाष्ठा श्रीकुंजबिहारी-बिहारिणी को निहारकर मैंने उन्हें सदैव के लिए अपनी आँखों में प्रतिष्ठित कर लिया है।

  8. कुटिल लम्ब कल चीकने - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (4)

    श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन पर समर्पित कर देती है।

  9. सुख की संधि समझे बिना - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (5)

    सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर में डूब-उतर रहे हैं और भारी कष्ट भोग रहे हैं। कोई-कोई चतुरसखी ही इस वास्तविक स्वरूप को समझ पाती है और परम आनंद को प्राप्त करती है।

  10. अलकैं छूटीं वदन पर श्रम जल - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (3)

    सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी लटें उनके कपोलों पर लटकी हैं और श्रम-बिंदु मुखचन्द्र को अलंकृत किये हैं।

  11. जो तो हौं साँचौ भजौं, श्री स्वामी हरिदास - श्री चतुर दास जी की वाणी (2)

    हे लाड़िली जू (श्री राधा)! यदि मैं सच्चे हृदय से और पूर्ण निष्ठा के साथ श्री स्वामी हरिदास जी का भजन करता हूँ, तो आप मुझ पर यह कृपा कीजिये कि मुझे अपने परम प्रिय श्री वृन्दावन धाम का नित्य वास प्रदान कर दीजिये।

  12. चतुरदास (श्री) हरिदास कै, अद्भुत नित्य बिहार - श्री चतुर दास जी की वाणी (12)

    श्री चतुरदास जी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी का यह अद्भुत नित्य विहार है, जहाँ औरों की तो क्या चले, साक्षात् वेद की बुद्धि से भी यह परे है।

  13. चतुरदास चित चौंप सों - श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (1)

    श्री चतुरदास जी के अनुसार, हृदय में परम उल्लास संजोकर श्री वृन्दावन धाम में निवास करना चाहिए और निरंतर युगल सरकार के दिव्य केलि-विहार का दर्शन करना चाहिए। इस विशुद्ध नित्य-विहार के रसास्वादन के अतिरिक्त अंतःकरण में अन्य कोई भी सांसरिक अथवा आध्यात्मिक अभिलाषा शेष नहीं रहनी चाहिए।