विनय कुंडलियाँ

विनय कुंडलियाँ श्री अलबेली अली द्वारा लिखित नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधिका को समर्पित विनम्र प्रार्थनाओं एवं दोहों का संग्रह है।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. मो सौ नहिं कोऊ पातकी तुमसौ अधम उधारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

    मेरे समान कोई पातकी नहीं और आपके समान कोई अधम उधार नहीं । हे रसिक क़ुंवरि श्री राधिके, कृपया आप वही कीजिए जिसके लिए आप ‘अधम उधारन’ जानी जाती हैं [अर्थात् मुझ जैसे पतित का कल्याण कीजिए जो आपकी शरण में आया है ] ।

  2. ब्रजनागरि चूड़ामनि सुख सागर रस रास - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (7)

    हे ब्रज नागरी, परम चूड़ामणि रानी, सुख सागर एवं रस रास को बरसाने वाली स्वामिनी, श्री राधा ! ऐसी कृपा करो कि मेरे हंस रूपी मन को तुम अपने चरण रूपी पिंजरे में क़ैद करके रखो जिससे मेरा यह मन सदा प्रफुल्लित रहेगा ।

  3. क्वास ! क्वास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख - रासि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (6)

    हे सुख की राशि स्वरूपा स्वामिनी [श्री राधा], तुम कहाँ हो? कहाँ हो? मुझ शणागत का प्रतिपालन करके मेरे मन की अभिलाषा [तुम्हारे दर्शन एवं सेवा] को पूर्ण करो ।

  4. राधा नाम नवल नामावली सो निस दिन उर धारी - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ

    श्री अलबेली अलि कहती हैं कि श्री राधा की नवल नामावली को निशिदिन हृदय में धारण कर, एक श्री राधा महारानी के भरोसे, वह दोनों पाऊँ पसार कर, निश्चिंत होकर, सोती हैं ।

  5. अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

    हे रसिक सुकुमारी लाड़ली श्री राधिके! मैं दोनों हाथों को जोड़कर यही विनती करती हूँ कि मेरा मन दिन-रात, हर क्षण तुम्हारे प्रेम की डोर से बँधा रहे।

  6. कवास ! कवास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख रासि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (6)

    हे स्वामिनी! हे परम सुख की राशि! आप मेरी रक्षा करें, रक्षा करें। आप शरणागत का पालन करने वाली हैं, अतः मेरे मन की जो अभिलाषा है, उसे पूर्ण कीजिए।

  7. काम क्रोध दंभनि भरयौ, बंध्यौ विषय की डोर - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (9)

    हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन काम, क्रोध, दंभ और विषयासक्ति से भरा हुआ है, और मैं विषयों की डोर में बँधा पड़ा हूँ। ऐसे मुझ अधम और पापी के लिए आप जैसे करुणासिंधु की शरण के अतिरिक्त कोई दूसरा आश्रय नहीं है।

  8. अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा सिंधु अपार - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (4)

    हे अपार करुणा-सिन्धु लाड़िली श्री राधा! मैं बार-बार पुकार कर यही कहता हूँ कि आपके अतिरिक्त मेरा कोई नहीं है; आप ही मेरा एकमात्र आश्रय हैं।

  9. मो सौ नहिं कोऊ पातकी, तुमसौ अधम उधारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

    हे रसिक सकुँवारि (हे सुकोमल श्री राधा)! मेरे समान कोई दूसरा पापी नहीं है और आपके समान अधमों का उद्धार करने वाली कोई दूसरी नहीं है। अतः, आप जैसी (कृपालु) हैं, वैसा ही मेरे साथ भी व्यवहार करें।

  10. कामी के मन काम, दाम ज्यौं रंकहि भावै - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (7)

    जिस प्रकार घोर कामी व्यक्ति को काम प्रिय होता है, एवं रंक को धन प्रिय है, हे नवल-किशोरी राधिका! कृपा कर ऐसी प्रीति मुझे भी आपके चरण-कमलों में प्रदान कीजिए।

  11. जो चाहौ सो करौ कुँवरि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

    हे श्री राधे! आप ही तीनों प्रकार के तापों और अज्ञान रूपी अंधकार का हरण करने वाली हैं।। श्री अलबेली अलि आपके चरण-कमलों की शरण में आ चुकी है; अब आपको जैसा भावे वैसा ही कीजिए।