मो सौ नहिं कोऊ पातकी तुमसौ अधम उधारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)
मेरे समान कोई पातकी नहीं और आपके समान कोई अधम उधार नहीं । हे रसिक क़ुंवरि श्री राधिके, कृपया आप वही कीजिए जिसके लिए आप ‘अधम उधारन’ जानी जाती हैं [अर्थात् मुझ जैसे पतित का कल्याण कीजिए जो आपकी शरण में आया है ] ।
