श्री विट्ठलनाथ जी

श्री विठ्ठल नाथ (1516-1588), जो गोसाईं जी के नाम से लोकप्रिय हैं, वल्लभाचार्य के छोटे पुत्र थे, जिन्होंने हिंदू धर्म के पुष्टिमार्ग धार्मिक संप्रदाय की स्थापना की थी।

38 लेख उपलब्ध हैं

  1. निरतत रास में पीय-प्यारी - श्री विट्ठल दास

    श्रीधाम वृन्दावन की परम पावन भूमि पर, शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात्रि में, यमुना किनारे श्री राधा-कृष्ण (पिय-प्यारी) दिव्य रास में मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं।

  2. कदंबारूढं या निजपतिमजानंत्यहनि - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (7)

    प्रियतम के कदंबारूढ़ होने से अनभिज्ञ, जिन्हें सखी से प्रियतम की कथा के मध्य विरह हुआ, पश्चात् सब ओर दृष्टि कर अकस्मात जब ऊपर प्रियतम के दर्शन से मुख कमल लज्जा एवं प्रेम से उन्मत्त हो गए - ऐसी श्री राधा मेरी परम गति हों।

  3. कदँब तर ठाड़े हैं पिय प्यारी - श्री विट्ठल दास

    हे सखियों! आज की कैसी अद्भुत शोभा बनी है। प्रीतम श्री कृष्ण के मस्तक पर तो मोर मुकुट शोभा दे रहा है और प्रियाजी श्री राधा ने सुंदर लहरिया की सारी पहन रखी है।

  4. फूल महल में बैठे माधो संग वृषभान दुलारी - श्री विट्ठल दास

    श्री वृषभानुजी नंदिनी श्री राधा जू एवं माधव श्री कृष्ण फूलों के महल में विराजमान हैं । दोनों ने फूलों के ही हार डाले हैं एवं फूलों से ही संपूर्ण श्रृंगार किया है, एवं फूलों के ही बने मुकुट पहने हुए हैं ।

  5. आह्लादामृतवर्षिणीं भगवतीं - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (8)

    श्री राधा प्रेम रस का वर्षण करने वाली भगवदी स्वामिनी हैं एवं सब के द्वारा परम पूजनीय चिंतामणि हैं । वे श्री कृष्ण को आकर्षण करने वाली उनकी प्रियतमा हैं जो श्री कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं । श्री राधा, श्री कृष्ण के प्रेम का वर्धन करने वाली, रस की अधिष्ठात्री हैं जो उन्हें क्रीड़ा रस के आस्वादन से पोषण करती हैं । मैं सुख का वर्धन करने वाली, सौंदर्य की सीमा, स्वामिनी श्री राधा का नमन करता हूँ जिनको नित्य निरंतर कृष्ण के नाम एवं गुण रुचिकर हैं ।

  6. गेहे निकुजं निशि संगतायाः प्रियेण तल्पे विनिवेशितायाः - श्री विट्ठलनाथ, स्वामिनी स्रोत (12)

    हे स्वामिनी [राधे], ऐसा कब होगा कि जब रात्रि में निकुंज गृह में प्रियतम के साथ सुकोमल शय्या पर विराजमान, आपके चरण कमलों को मैं अपने केश समूह से प्रसन्नतापूर्वक पोंछूँगी ।

  7. वृन्दावने चारु बृहद्वने - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), यमुनाष्टपदी (अंतिम श्लोक)

    हे सूर्यपुत्री यमुना जी! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप वृंदावन धाम में ही मेरा मनोरथ पूर्ण करें, जहाँ यमुना तट पर श्री कृष्ण का नित्य विहार दृष्टिगोचर होता है ।

  8. अमंद प्रेमार्द्रात्किसलयमयात्केलिशयन - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (5)

    प्रियतम के चर्वित ताम्बूल को मुख में रख केलिशयन उपरांत उषा काल में जग कर अरुण कपोल वर्णित ताम्बूल प्रक्षेप का विचार करने वाली, कुञ्ज से घर को पधारते समय मार्ग में कुछ समय विश्राम कर जिनके अंग केलिशयन से शिथिल हैं, वे श्री राधा मुझे नित्य अपनी चर्वित ताम्बूल प्रदान करें ।

  9. निधाय श्यामांसे निजभुजलतामिंदु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (4)

    जिन्होंने श्री श्याम सुन्दर के स्कन्धों पर भुजलता अर्पित किये हुए हैं, जो कमल के समान खिले निज नेत्रों की दृष्टि से निहार लाल जी [श्री कृष्ण] को प्रेम की वर्षा करने वाली चंद्रवदना हैं, जिनका अति हर्ष से गान कर श्री लालजी का स्वर से स्वर मिला मुरली वादन करना मंजुल है, ऐसी श्री राधा का दर्शन कर मैं कब कृतार्थ होऊँगा?

  10. प्रियेणाक्ष्णा संसूचित् नवनिकुंजेषु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (6)

    प्रियतम ने अपने नेत्रों द्वारा श्री प्रिया जी को नव निकुंज में पधारने के लिए सूचित किया जहां केलि लीला हेतु घने वन में अनेक रंगों के पुष्पों एवं चित्रों से अति सुंदर सेज की रचना की है, जहाँ अनेक भौंरे गुंजार कर रहे हैं, पवन मंद मंद बह रहा है, ऐसी गुप्त कुंज में श्री राधा मुझे अपने चरणों की सेवा प्रदान करें ।

  11. निमंत्र्य प्रातर्या निजहृदयनाथं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (3)

    निज हृदयनाथ श्री कृष्ण को गूढ़ निमंत्रण दे प्रातः काल गुप्त रीती से अपने भवन में बुलाकर उनकी सेवा कर अति हर्ष से भोजन कराकर उनके संग से ह्रदय का विरह शमन करनेवाली श्री राधा नित्य मेरे ह्रदय में स्थित रहें ।

  12. श्रीराधां रसकेश्वरीं प्राणयिनीं सर्वांङ्गभूषावृताम् - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (6)

    श्री राधा रसिक संतों की ईश्वरी हैं, जो भगवान कृष्ण की प्राण-प्रिय हैं, जिनके अंग विभिन्न अलंकरणों से सुसज्जित हैं, जो वृंदावन की 'केली' लीला में सर्व-कुशल हैं, जिनका वैभव करोड़ों चन्द्रमाओं से भी अधिक शोभायमान है

  13. बनत नांही यमुना जी को नहिबो - श्री विट्ठल दास

    एक ब्रजांगना कहती है कि श्री यमुना जी में स्नान बन नहीं पायगा क्यूँकि श्यामसुंदर घाट पर खड़े मिलते हैं और हास्य विनोद करने लगते हैं, फिर घर जाना कठिन हो जाता है ।

  14. श्री श्यामां मधुरस्वरां सुनयनां - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (7)

    श्रीराधा की वाणी मधुर है और आंखें अति सुन्दर हैं, वे बहुत बुद्धिमान हैं और श्रीकृष्ण की प्रिय हैं। वे समस्त लक्षणों से परिपूर्ण हैं जो अपनी दासियों को प्रेम प्रदान करती हैं और सर्व इच्छा को पूर्ण करनेवाली हैं। मैं उन श्री राधा की आराधना एवं पूजा करता हूँ, जिनके समस्त अंग अत्यंत सुंदर हैं। जो श्री कृष्ण के वाम भाग में अवस्थित हैं, उन परम सुखमयी परमेश्वरि श्री राधा की मैं बार-बार वंदना करता हूँ।

  15. रासक्रीड़ासमासक्तं परात्परतमं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (5)

    युगल किशोर श्री राधा कृष्ण अत्यंत उदार हैं, रास-क्रीड़ा में आसक्त हैं तथा एक-दूसरे के प्रेम में विह्वल हैं। मैं उनके चरण कमलों को सदा प्रणाम करता हूँ।

  16. गौरश्यामं कृपासाध्यं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (4)

    मैं उन दिव्य युगल श्री गौर श्याम [राधा कृष्ण] को प्रणाम करता हूँ जो केवल कृपा साध्य हैं, कोटि-कोटि कंदर्पों से भी सुन्दर हैं एवं जिनकी कोटि-कोटि सखियाँ सेवा में उपस्थित हैं।

  17. किशोरं युगलंवन्दे वृन्दावनविहारिणम् - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (3)

    मैं उस युगल किशोर जोड़ी (राधा कृष्ण) को नमन करता हूं जो वृंदावन में विहार पारायण हैं, समस्त कलाओं एवं गुणों से युक्त हैं, एवं निकुंजों में निवास करते हैं। वे समस्त प्रकार के आध्यात्मिक विघ्न को मिटाने वाले हैं।