वृषभानुपर शतकम

वृषभानुपर शतक वृषभानुपर [बरसाना] की महिमा और माधुरी के 100 पदों का संग्रह है जिसे श्री वंशीअली जी द्वारा विरचित है ।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. न मन्येहं लोकं न बहु - श्री वृषभानुपुर शतक (103), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    मैं न लोक की और न वेद की बताई अनेक विधियों को मानता हूँ और न ही निपुण साधु-संतों की श्लाघ्य शुद्ध और सुखद हरि भक्ति को। परन्तु मैं तो वन भूमि में सदा श्यामसुन्दर के हृदय में क्रीड़ा करने वाले, ललिता के हाथों से सँवारे गये श्री राधा के युगल चरणों को ही जानता हूँ (अन्य कुछ नहीं जानता)।

  2. वपुर्मनो वागसवस्त्वयि - श्री वृषभानुपुर शतक (83), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    श्रीकृष्णचन्द्र प्रियाजी से कह रहे हैं – हे प्रिये ! मेरा शरीर, मन, वाणी एवं प्राण आप में ही हैं, आप निरन्तर मेरे द्वारा नितरां एकमात्र वाञ्छनीय हो अर्थात् सर्वदा आप की इच्छा करता रहता हूँ, मैं सत्य कह रहा हूँ, आपके चरण-स्पर्श की अभिलाषा से युक्त मेरा जीवन आपके ही द्वारा दिया गया है ।

  3. सखीवृंदवृता राधा रराज वर गह्वरे - श्री वृषभानुपुर शतक (75), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    परम रमणीय गह्वरवन में सखी-समूह से आवृत श्रीराधा ठीक उसी प्रकार सुशोभित हो रही हैं, जैसे तारागणों से आवृत (घिरा हुआ) शरद् ऋतु का पूर्ण चन्द्र आकाश में सुशोभित होता है ।

  4. किं कार्यं वत राधे - श्री वृषभानुपुर शतक (89), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    ललिता कह रही हैं – हे श्रीराधे ! अब आप ही बतायें, वह नीलमणि श्रीकृष्ण आपकी रूप- माधुरी पर अतिशय आसक्त हैं, मैं उनके लिये क्या कर सकती हूँ, मेरी कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसे मैं उनको नहीं दे सकती अर्थात् मेरी प्रत्येक वस्तु उनके लिये न्यौछावर है ।

  5. त्वं वनराज ! किशोरीचरण द्वन्द्व - श्री वृषभानुपुर शतक (52), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    हे वनराज ! किशोरी जू के युगल चरणों का दर्शन मुझे भी करा दो, जो ‘चरण’ घनश्याम श्रीकृष्ण के हृदय में विद्यमान ताप को हरण करने वाले हैं ।

  6. स्वकरे सितचामरन्दधद् - श्री वृषभानुपुर शतक (87), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    प्राणवल्लभा श्रीराधा जी मणिजड़ित श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, प्रियतम अपने हाथ में शुक्लवर्ण चँवर को लेकर अनुरागपूर्ण भाव से स्वामिनीजू की सेवा में लगे हुये हैं, (उनकी रूप माधुरी, सौकुमार्य आदि को देखकर) कदाचित् श्रीकृष्ण कुञ्जभवन में गिर पड़ते हैं और पुनः जैसे-तैसे अपने को सम्भालते हैं ।

  7. नेत्रे बुभुक्षिते मे राधापदयोर्विलोकनायेह - श्री वृषभानुपुर शतक (53)

    इस ब्रजभूमि में मेरे नेत्र श्रीराधाजी के चरणों के दर्शन करने के लिए भूखे (उत्कण्ठित) हैं, हे वृन्दावन ! श्रीचरणों के दर्शन की महिमा-सुधा के दान द्वारा मुझे तृप्त करो ।

  8. संस्पृश्य तत्पादतलं किशोरकः - श्री वृषभानुपुर शतक (37)

    नवल किशोर अपने हस्तकमल की भङ्गिमाओं द्वारा श्रीकिशोरीजी के चरणकमल का स्पर्श करके, चरणकमल से मकरन्द-रज को अपने नेत्रों से लगा रहे हैं पुनरपि वे तृप्त नहीं हो रहे हैं, पुनः पुनः श्रीकिशोरीजी के पद-रज की कामना कर रहे हैं ।

  9. आपाययित्वाधरसंश्रितं मधु - वृषभानुपुर शतक (46)

    श्रीलाड़िलीजी बीड़ी (ताम्बूल) चर्वण कर रही हैं, उस बीड़ी को अपने मुख से निकालकर लालजी को अर्पित कर रही हैं और लालजी उन किशोरीजी के श्रीमुख से चर्वित पान को अपने मुखारविन्द में ले रहे हैं, इसी व्याज (बहाने) से वे प्रियतम को अधराश्रित मधु का पान करा रहीं हैं ।

  10. पदयोः प्रविलाप्य यावकं - वृषभानुपुर शतक (17)

    अपने कर-कमल की भङ्गिमा कलापूर्ण (चातुरी) से अपनी प्रेयसी के चरणों में महावर लगाकर अत्यन्त गम्भीर भाव रूपी सागर में निमग्न प्रियतम श्रीकृष्ण यहाँ (गह्वरवन में) प्रियाचरणों में लोट रहे हैं ।

  11. पीत्वा मुखाम्बुज श्री मकरंदामृत- वृषभानुपुर शतक (15)

    श्री राधिका किशोरी जू के प्रति अनन्य भाव रखने वाले श्रीकृष्ण, स्वामिनी के मुखकमल से निःसृत मकरन्द रूप अमृत का पान करके उनके श्रीचरणों में गिरकर अपनी पिपासा को और अधिक करने की इच्छा करते हैं ।

  12. न याति तृप्ति शतशोथ घुष्टं - श्री वृषभानुपुर शतक (2), श्री वंशी अली द्वारा रचित

    जिस वृषभानुपुरी [बरसाना] का नाम देव समूह द्वारा वन्दनीय है, जिस पुरी के नाम के सैकड़ों (अनन्त) बार उच्चारण को श्रीकृष्ण सावधानीपूर्वक अपने कानों से पुनः पुनः श्रवण करते हैं तथापि वे तृप्त नहीं होते हैं । निश्चित ही यह वह नगरी है जिसके द्वारा अज (ब्रह्माजी) ने (ब्रह्माचल के रूप में) सुधा रस का पान कर अपने को कृतार्थ किया है ।