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  1. नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

    परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।

  2. परम प्रेम-आनंदमय - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (189.1)

    युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) परम प्रेम और आनंद से परिपूर्ण हैं, साक्षात् रस का ही स्वरूप हैं। वे श्री धाम वृन्दावन में यमुना के पावन तट पर, कदम्ब के वृक्ष के नीचे विहार करते हैं, जिसकी शोभा अलौकिक, अगाध और अनिर्वचनीय है।

  3. जय राधा माधव गोपीजन श्री वृन्दावन धाम - ब्रज के दोहे

    युगल सरकार, श्री राधा माधव की जय हो, व्रज गोपीजनों की जय हो, तथा परम पावन श्रीधाम वृन्दावन की जय हो। यमुना जी की जय हो, दिव्य लताओं की जय हो और उन सुंदर, सुखद कुंजों की जय हो, जो अत्यंत मनमोहक और आनंददायी हैं।

  4. ज्यौं ज्यौं इत देखियत - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)

    एक बार श्री नागरीदास जी को किसी विशेष कारण से मरुस्थल जाना पड़ा। वहाँ की निर्जन भूमि में निवास करते हुए उनके हृदय में ब्रज की गहन स्मृति जाग उठी — जैसे-जैसे मेरी दृष्टि इन भगवद-विमुख, प्रेमहीन जीवों पर पड़ती है, वैसे-वैसे ब्रजवासियों की निश्छल भक्ति और माधुर्य की स्मृति तीव्रतर होती जाती है।

  5. नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (84)

    श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।

  6. बस वृन्दावन धाम में जो चाहे विश्राम - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (8)

    जो जीव विश्राम चाहता है, वह वृंदावन धाम में निवास करे। कालिंदी (यमुना) के जल का पान करे और राधा-श्याम का नाम रटे ।

  7. कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (33)

    जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो।

  8. जाऊँ वाकी बलिहारी पावन ब्रजरज परसावै री - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष

    मैं उसकी बलिहारी जाता हूँ जो मेरे अंगों पर परम पावन ब्रजरज का स्पर्श कराता है, यमुना जी के दर्शन कराकर उसके शीतल जल का पान कराता है।

  9. श्री अभयराम जी की जीवनी

    श्री अभयराम जी जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री 'श्रीजी' श्री निम्बार्कशरण देवाचार्य जी के शिष्य थे। श्री अभयराम जी की जन्म तिथि का ठीक-ठीक पता नहीं चलता पर अन्तः साक्ष्य एवं वंश परम्परा के आधार पर ज्ञात होता है कि इनका जन्म 1830-1835 ईसवी के आसपास हुआ होगा।

  10. कूल कलिंदी नीप तर - ब्रज के दोहे

    वृंदावन में, श्री यमुना के तट पर कदंब वृक्ष के नीचे सुशोभित श्री श्यामा-श्याम अत्यंत मनोहर हैं। मेरी ऐसी कामना है कि इनकी यह मधुर छवि सदा ही मेरे मन में बसी रहे।

  11. मधुवन - ब्रज की महिमा

    मधुवन ब्रज के प्रसिद्ध 12 वनों में से एक है । सतयुग में मधु नामक एक दैत्यका भगवान ने यहाँ वध किया था । इस कारण भगवान का नाम मधुसूदन हो गया । अतः भगवान् श्रीमधुसूदन के नामपर इस वनका नाम मधुवन पड़ा है, क्योंकि यह मधुवन भगवान् श्रीमधुसूदन के समान ही प्रिय एवं मधुर है ।

  12. प्रिया छवि बार बार कालिन्दी की धारधार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (91)

    श्री प्रिया जी की रसमयी छवि को बार बार निहार, जहां कालिन्दी [यमुना] की लहरें हिलोरे ले रही हैं और जिनके के अंग संग चार दोनों तरफ़ चार चार सखियाँ खड़ी हैं।

  13. आज सखी बनी है अनोखी जोरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (178)

    हे सखी! आज जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम की जोड़ी बड़ी सुन्दर लग रही है । दोनों अपनी रुचि अनुसार श्री वृन्दावन के मनोहर श्री यमुना तट पर विहार कर रहे हैं । वे सुन्दर फूल-बंगला में सुशोभित हैं ।

  14. वेदों में न देखा ब्रह्म शास्त्रों में न देखा ब्रह्म - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (32)

    न मैंने उन्हें वेदों में देखा है, न ही ब्रह्म शास्त्रों में। मैंने उन्हें वेदांत दर्शन या ब्रह्म के मूल में भी नहीं पाया।