115 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

    हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।

  2. मुरली मधुर बजाय के हँसत - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (03)

    जब घनश्याम (श्री कृष्ण) अपनी मुरली की मधुर तान छेड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हैं, तब उनकी वह मुस्कान ऐसी प्रतीत होती है मानो गहरे नीले बादलों (श्याम शरीर) के बीच बिजली (दमक) चमक रही हो।

  3. वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)

    श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।

  4. प्यारी पग नूपुर मधुर, धुनि सुनिवे के हेत - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

    श्री राधा के चरणों में सुशोभित नूपुरों की मधुर ध्वनि इतनी मनोहर है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रीकृष्ण के कान उसी ध्वनि को सुनने के लिए उनके चरणों में आकर बस गए हैं। श्री राधा के चरण परम सुख प्रदान करते हैं।

  5. कालीदह कूल कुंजके माहीं - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (28)

    मेरी यही अभिलाषा है कि मैं कालीदह के तट पर स्थित कुंजों में एक भ्रमरी बनकर वृक्षों की डालियों पर निवास करूँ अथवा निधिवन का तोता या कोयल बन जाऊँ और मधुर स्वर में निरंतर 'राधा' नाम का ही गान करूँ।

  6. बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

    कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है।

  7. करौ कृपा श्रीराधिका- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (15.1)

    हे श्रीराधिका, मुझ पर कृपा कीजिए! मैं बार-बार यही विनती करता हूँ कि आपकी मधुर और परम पवित्र स्मृति सदा बनी रहे, जो मंगलमय और समस्त सुखों का सार है।

  8. खेलत हैं वसंत विहारी विहारिन - गोस्वामी श्रीहितलाल जी

    युगल सरकार, श्री विहारी-विहारिन, आज वसंत उत्सव माना रहे हैं। अबीर और गुलाल के रस-मेघ उमड़ रहे हैं, मानो रंगों की पिचकारी से प्रेम-रंग बरस रहा हो।

  9. कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (45)

    कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।

  10. जमुना-पुलिन कुंज गहबर की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

    ऐसा कब होगा कि मैं यमुना-तट के किसी एकांत कुंज में किसी वृक्ष पर कोयल बनकर कूकूं, अथवा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों का भौंरा बनकर मधुर-मधुर गुंजार उन्हें सुनाऊं।

  11. आज झूलत लड़ेती झुलावत ललित त्रिभंगी - श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)

    आज ललित त्रिभंगी लाल श्री कृष्ण श्री राधा को झूला झुला रहे हैं । श्री राधा के अंग स्वाभाविक श्रृंगार से केसरी रंग से रंगे चमक रहे हैं, और देह पर पंचरंगी साड़ी सजी है। [1]

  12. लडैती आनंद निधि सुखरासी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)

    नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं।

  13. प्रेम धाम वृन्दाविपिन मध्य मधुर वर जोर - ब्रज के दोहे

    वृन्दावन धाम दिव्य प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप है, जहाँ युगल जोड़ी श्री राधा-कृष्ण मधुरता की पराकाष्ठा के साथ विराजमान हैं। वहाँ का प्रत्येक कण रस से सराबोर है — ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रृंगार एवं माधुर्य-रस की नदियाँ चारों ओर झिलमिलाती हुई प्रवाहित हो रही हैं।

  14. रसना रस की खानि तू सरस मधुर प्रिय तोय - ब्रज के दोहे

    हे जिह्वा! तू तो रसों की ख़ान है, तुझे सदा सरस-मधुर विषयों में ही आनंद आता है — तो क्यों न तू “श्रीराधा” नाम रूपी प्रेमरस को नित्य पिया कर क्योंकि इसके समान मधुरता कहीं और नहीं है।

  15. देखो सुंदरता की सीवाँ - श्री रूपरसिक देवाचार्य

    हे सखी! देखो तो सही, यह स्वरूप तो स्वयं सौंदर्य की पराकाष्ठा है। यमुना के तट पर, कदम्ब वृक्ष की शीतल छाया में श्री श्यामाश्याम गलबहियाँ डाले खड़े हैं।

  16. राधे दै बृंदावन-बास - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)

    हे श्रीराधे! कृपा करके मुझे श्रीवृंदावन में निवास प्रदान कीजिए। मेरा मन उसी प्रकार आप में स्थिर बना रहे, जैसे कोई पनिहारिन अपने सिर पर मटका रखे चलती है— सखियों से हँस-बोल भी रही होती है, पर उसका ध्यान सदा मटकी पर ही टिका रहता है। ऐसी कृपा हो कि मेरा यह तन भी आपकी सेवा में निरंतर लगा रहे।

  17. फूले हैं पलास आस पास बन बागन में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, बसन्त ऋतु (26)

    चारों ओर पलाश के फूल खिल उठे हैं, जिनकी मनोहर छटा ने वनों और उपवनों को रंगों से भर दिया है। कोयल अपनी मधुर वाणी में कूकने लगी है, मानो प्रेम का संदेश सुना रही हो।

  18. आज सखी सेवाकुंज कुंजन ते आवत जू - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (96)

    हे सखी! देखो, आज श्री राधा प्यारी अपने प्रियतम श्री कृष्ण के संग सेवाकुंज की सघन लताओं से प्रेम और सुख की अमृतवर्षा करती हुई आ रही हैं।

  19. चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1194)

    सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।”

  20. कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

    अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं ।