प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन हमारे - श्री द्वारकेश जी
हमारे मन के लिए प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन ही महान सुखस्वरूप और सदा शांति के धाम हैं।
87 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं
हमारे मन के लिए प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन ही महान सुखस्वरूप और सदा शांति के धाम हैं।
उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।
श्री राधा ही जीवन का सार हैं। भुक्ति, मुक्ति और भोग सब उनके सामने गौण हैं। वह जिह्वा दहन करने के योग्य है जो “राधा राधा” न कहे, क्योंकि ऐसी रसना ने अपने जीवन के एकमात्र परम लक्ष्य को विस्मृत कर दिया है।
वृषभानु-नन्दिनी श्री राधा के चरण-कमलों के प्रति जो अनन्य भक्ति है, वह तो खिले हुए गुलाब की कली के समान सुकोमल और सुगंधित है। इसके विपरीत, मोक्ष (मुक्ति) तो केवल पीली मिट्टी के एक सूखे ढेले के समान है, जिसमें न तो कोई चमक (आब) है और न ही कोई रस।
प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त नियम और बंधन स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं अर्थात् प्रेम किसी भी नियम का पालन नहीं करता।
मुक्ति (मोक्ष) और भुक्ति (भोग) भीतर से खोखले हैं, जबकि भक्ति रस और आनंद से परिपूर्ण है। मुक्ति स्थिर जल-भरी पोखरी के समान है, पर भक्ति बहती हुई स्वच्छ गंगा की तरह जीवंत और प्रवाहमान है।
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।
वृन्दावन की महतरानी (भंगिन) भी मुक्ति को अपने पैरों से ठुकरा कर चल देती है। इसमें आश्चर्य क्या है, यह तो साक्षात श्री राधा का महल है, जिसकी वे दासी हैं।
युगल रस के उपासक न केवल भुक्ति (सांसारिक) बल्कि छः प्रकार की मुक्ति (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य, सारष्टि एवं कैवल्य) की कामना को भी त्याग देते हैं। वे प्रिया-प्रियतम में निष्काम प्रेम को बढ़ाकर, संसार के आवागमन से सहजता से मुक्त हो जाते हैं एवं उनकी महल-टहल को प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे उपासक प्रेम में अनुरक्त होकर युगल विहार का भावपूर्ण नेत्रों से सदा दर्शन करते रहते हैं।
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।
अरे मन! चलकर श्री बरसाने ग्राम में निवास कर, जहाँ पूर्णब्रह्म घनश्याम भी अपने मुकुट से झाड़ू लगाया करते हैं।
मुझे तो केवल श्री राधारानी के चरण-कमलों का ही सहारा है। कोई तीर्थ करके पुण्य कमाता है, कोई तपस्या करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई मौन धारण करता है, और कोई ब्रह्मभाव में विचारमग्न रहता है।
रसिक चूड़ामणि श्री कृष्ण से जहां के राजा हैं एवं सखियों की मुकुट मणि श्री राधा जहां की महारानी हैं।
स्वामी श्री हरिदास जी की विशुद्ध नित्य विहार उपासना में न तो संगम-तीर्थ (कुम्भ स्नान) का महत्व है और न ही सूतक एवं पातक का।
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है।
मेरा मन तो किशोरी जी के चरणों में अनुरक्त हो गया है। मैं अनादि काल से मोह की नींद में सो रहा था, रसिकों ने मुझे जगा दिया है।
हे श्रीराधे! आपके चरण-कमलों के दर्शन प्राप्त करने पर, मैं अपने जीवन को परम सफल अनुभव करूँगी। उस समय मुझे, श्रुतियों द्वार प्रतिपादित मार्ग पर चलना, संयम-नियम आदि अध्यवसाय करना तथा अनेकानेक साधनों को अपनाना - ये सभी निरर्थक प्रतीत होने लगेंगे।
श्री वृंदावन के वासी धन्य हैं, जिनकी प्रशंसा स्वयं शुकदेव जी, उद्धव जी, ब्रह्मा जी, लक्ष्मी जी, आदि करते हैं।
अष्ट सिद्धि एवं नव निधियों का दाता श्री राधा नाम है। श्री श्यामसुन्दर भुक्ति, मुक्ति एवं भक्ति (सब कुछ) श्री राधा के बल से ही प्रदान करते हैं।
इस संसार में ब्रज जैसा कोई स्थान नहीं है, और न ही ब्रजवासियों के समान कोई नर या नारी।