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  1. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  2. वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)

    श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।

  3. लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)

    हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।

  4. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  5. देहु निकुंज निवास स्वामिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

    हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।

  6. वृन्दावन नीरस रसिक बनावत - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है।

  7. श्यामा चरण कमल की आस - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (32)

    हे श्यामा जू! मुझे केवल आपके चरण-कमलों की ही आशा है। हे श्री वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे अपने समीप ही स्थान दीजिए। जहाँ यमुना जी का प्यारा तट सुशोभित है और आपका अपना निज-खास स्थली श्री सेवाकुञ्ज है, वहीं मुझे वास दीजिए।

  8. विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।

  9. आरति कीजै सुंदरवर की - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (39)

    इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।

  10. चले पिय भाँवती रस लेन - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।

  11. श्याम रूप श्रीराधिका - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।

  12. रसिकजन की मैं बलिहारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

    मैं उन रसिकजनों पर बलिहारी जाती हूँ, जिनके हृदय में अनन्य रूप से प्रिया-प्रियतम बसते हैं । वे वृन्दावन धाम में विचरण करते हैं, स्वयं निरभिमानी होकर भी सबको मान देने वाले वचन बोलते हैं।

  13. जयति जयति वृषभानु दुलारी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (06)

    वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बार-बार जय हो। उस परम मनोहर श्री धाम वृन्दावन की जय हो, जहाँ लताओं, कुंजों और पुष्पों की सुगन्धित फुलवारी सदा शोभायमान रहती है।

  14. रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)

    रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]

  15. स्यामा सुकुमारी प्राणप्यारी श्रीविहारीजी की - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    श्रीराधा परम सुकुमारी हैं, श्रीविहारी (कृष्ण) की प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं। वे परम सुंदर, सब की शिरोमणि स्वामिनी हैं।

  16. निकुंज में ठाढ़े जुगल किसोर - श्री रूप मंजरी

    निकुंज में युगल सरकार, श्री राधा-कृष्ण युगल अत्यंत सुशोभित हैं, दोनों ने एक-दूसरे के गले में बाँहें डाल रखी हैं। आलस्य से भरी प्रभात बेला में वे जागे हैं, और उनके प्रेम की छाया से मानो भोर भी रंजित हो गई है।