अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)
अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।
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अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।
हे श्रीवृन्दावन की समस्त लताओं, बेलों और वृक्षों! आप सब मिलकर मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे परम सुकुमारी प्यारी श्रीराधाजी हमसे हिल-मिलकर अत्यंत लाड़-दुलार करें।
जीभ निरंतर प्रेम के परम सुंदर नाम 'राधा-राधा' का ही रटन कर रही है। श्री राधा साक्षात् प्रेम का धाम हैं और वे ही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।
मेरी स्वामिनी श्रीराधा जी समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं। वे नूतन निकुंज-भवन में अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ नित्य विहार करती हुई सुशोभित हो रही हैं।
हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।
हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।
क्षण-क्षण नित्य नवीन रहने वाली श्री लाड़ली जी और प्रियतम श्यामसुन्दर निरंतर दिव्य रास-क्रीड़ा का विलास करते रहें। आप दोनों का यह परम निर्मल और श्रेष्ठ प्रेम नित्य नवीन भाव से दिव्य रस और आनंद से सदैव परिपूर्ण बना रहे।
मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।
हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।
एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।
हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।
श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है।
हे श्यामा जू! मुझे केवल आपके चरण-कमलों की ही आशा है। हे श्री वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे अपने समीप ही स्थान दीजिए। जहाँ यमुना जी का प्यारा तट सुशोभित है और आपका अपना निज-खास स्थली श्री सेवाकुञ्ज है, वहीं मुझे वास दीजिए।
श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।
इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।
प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।
श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।
निशदिन राधा‑नाम का ही भजन करना चाहिए। जब कोई मुझे यह नाम सुनाता है, तभी मेरे हृदय को वास्तविक शांति (चैन) मिलती है।