कबधौं हृदै क्यारी में प्रेम - ब्रज के कवित्त
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
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हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है।
जिन-जिन अपराधी जीवों ने सिर झुकाकर और रसना से आपका नाम उच्चारित किया, उन्हें आपने अपने निज परिकर में स्थान देकर अपनी सेवा का अधिकारी बना लिया।
हे श्रीराधे! अब कृपया शीघ्र मुझे संभाल लीजिए। हे परम नागरी! अब तनिक भी देर न लगाइए, मुझे अपनी निज दासी जान, मुझ पर कृपादृष्टि डालिए।
श्री स्वामिनी जी (श्री राधा) नित्य सिद्ध हैं, और उनके दास एवं परिकर भी नित्य सिद्ध हैं जो सदा नित्य विहार के विलास रस का सेवन करते रहते हैं।
श्री राधा जू के चरणों के नूपुर की झंकार को अपने कानों से सुना है । हे किशोरी लड़ैती जू, अब ऐसी कृपा हो कि आप मुझे अपना बनाकर, अपने परम अंतरंग नित्य विहार का दर्शन करवाओ ।
श्री सरस माधुरी जी कहते हैं कि धाम का ध्यान करना सुख का मूल है । जो धाम का ध्यान करता है वह श्री राधा कृष्ण के निज परिकर में स्वतः ही पहुँच जाता है और परमानंद को प्राप्त करता है ।
माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।
हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं ।
हे श्री राधारमण लाल, यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं, तो कृपया मुझे अपनी प्राण प्रिया (श्री राधा) के परिकर की दासी बना दीजिए ।
जहाँ श्री श्यामा-श्याम का परम धाम श्री वृंदावन है, जहाँ उनके समस्त परिकर विराजते हैं, जहाँ सहज ही अपार रस बरसता है, वहीं मेरे नैंन भी नित्य विहार को अपलक निहारते हैं।
सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।
श्री वृन्दावन धाम की उपमा स्वयं श्री वृन्दावन ही है, इसकी तुलना किसी और से करना असंभव है। यह अत्यधिक मधुर और दिव्य है, इसलिए मैं इस पवित्र धाम का वंदन करता हूँ।
जिसकी [जिस जीव की] श्री राधा सी स्वामिनी हैं उसे किस बात की कमी है ? वह ऐसी स्वामिनी हैं जो श्री वृंदावन धाम की ठकुरानी हैं एवं अखिल ब्रह्मांडों के स्वामी श्याम सुंदर भी नित्य ही जिनके चरणों से लगे रहते हैं ।
श्री बणीठणी जी की रचना बड़ी सरस है एवं युगल किशोर श्री श्यामाश्याम की लीलाओं से परिपुष्ट है। इन्होने अपने उपास्य श्री राधा कृष्ण के यश का विस्तार किया।
हे किशोरी जी, मेरे मन में अभिलाषा है कि मैं श्री वृंदावन धाम जैसी रजधानी में आपकी नित्य सेवा करूँ ।
श्री वृन्दावन धाम प्रेम के रंग में रंगा हुआ है। यहाँ की भूमि बड़ी ही सुख देनेवाली है और अद्भुत आनंद प्रदान करनेवाली है।