16 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री ललिता सिखवत रस परिकर की - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26)

    निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है।

  2. जिन जिन अपराधिन सिर नायौ - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (37)

    जिन-जिन अपराधी जीवों ने सिर झुकाकर और रसना से आपका नाम उच्चारित किया, उन्हें आपने अपने निज परिकर में स्थान देकर अपनी सेवा का अधिकारी बना लिया।

  3. नित्य सिद्ध श्री स्वामिनी - श्री पीतांबर देव जी, श्री पीतांबर देव जी की बानी

    श्री स्वामिनी जी (श्री राधा) नित्य सिद्ध हैं, और उनके दास एवं परिकर भी नित्य सिद्ध हैं जो सदा नित्य विहार के विलास रस का सेवन करते रहते हैं।

  4. सुनो जी कानैं नूपूररो झनकार - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (32)

    श्री राधा जू के चरणों के नूपुर की झंकार को अपने कानों से सुना है । हे किशोरी लड़ैती जू, अब ऐसी कृपा हो कि आप मुझे अपना बनाकर, अपने परम अंतरंग नित्य विहार का दर्शन करवाओ ।

  5. सरसमाधुरी ने कह्यौ, धाम ध्यान सुखकंद - श्री सरस माधुरी

    श्री सरस माधुरी जी कहते हैं कि धाम का ध्यान करना सुख का मूल है । जो धाम का ध्यान करता है वह श्री राधा कृष्ण के निज परिकर में स्वतः ही पहुँच जाता है और परमानंद को प्राप्त करता है ।

  6. श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

    माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।

  7. हमारी राधे, अति भोरी सरकार - श्री कृपालु जी, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (94)

    हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं ।

  8. परम धाम परिकर जहाँ, आनंद सहज अपार - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    जहाँ श्री श्यामा-श्याम का परम धाम श्री वृंदावन है, जहाँ उनके समस्त परिकर विराजते हैं, जहाँ सहज ही अपार रस बरसता है, वहीं मेरे नैंन भी नित्य विहार को अपलक निहारते हैं।

  9. जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)

    सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।

  10. वृन्दावन की तौ उपमा कौं वृन्दावन ही हैं - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (3)

    श्री वृन्दावन धाम की उपमा स्वयं श्री वृन्दावन ही है, इसकी तुलना किसी और से करना असंभव है। यह अत्यधिक मधुर और दिव्य है, इसलिए मैं इस पवित्र धाम का वंदन करता हूँ।

  11. श्री राधा सी स्वामिनि जाकै, कमी कौन बात की ताकैं - श्री किशोरी अलि जी

    जिसकी [जिस जीव की] श्री राधा सी स्वामिनी हैं उसे किस बात की कमी है ? वह ऐसी स्वामिनी हैं जो श्री वृंदावन धाम की ठकुरानी हैं एवं अखिल ब्रह्मांडों के स्वामी श्याम सुंदर भी नित्य ही जिनके चरणों से लगे रहते हैं ।

  12. श्री बणीठणी जी की जीवनी 

    श्री बणीठणी जी की रचना बड़ी सरस है एवं युगल किशोर श्री श्यामाश्याम की लीलाओं से परिपुष्ट है। इन्होने अपने उपास्य श्री राधा कृष्ण के यश का विस्तार किया।