prasad

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  1. यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी

    यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।

  2. राधा मंगल-मालती सरस मधुब्रत - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (90)

    परम-हितकारी श्रीराधा मालती के फूल के समान हैं, जिनके रस का पान करने के लिए श्यामसुन्दर भ्रमर के सामान सदा मंडराते रहते हैं। श्री धाम वृन्दावन में यमुना के तट पर सदा सुशोभित रहने वाली यह युगल जोड़ी रसिकों का जीवन-प्राण है।

  3. अरज सुनौ हो राधा महारानी - श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली

    हे श्रीराधा महारानी! आप मेरी यह प्रार्थना सुनिए। हे राधे! मुझे अपने परम पावन श्रीवृन्दावन का वास प्रदान कीजिए और आपके प्रेम-प्रसाद स्वरूप श्रीयमुना जी का जल प्राप्त कराइए।

  4. परम प्रेम-आनंदमय - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (189.1)

    युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) परम प्रेम और आनंद से परिपूर्ण हैं, साक्षात् रस का ही स्वरूप हैं। वे श्री धाम वृन्दावन में यमुना के पावन तट पर, कदम्ब के वृक्ष के नीचे विहार करते हैं, जिसकी शोभा अलौकिक, अगाध और अनिर्वचनीय है।

  5. करौ कृपा श्रीराधिका- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (15.1)

    हे श्रीराधिका, मुझ पर कृपा कीजिए! मैं बार-बार यही विनती करता हूँ कि आपकी मधुर और परम पवित्र स्मृति सदा बनी रहे, जो मंगलमय और समस्त सुखों का सार है।

  6. हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें - श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (13)

    हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं।

  7. राधा रास-सिरोमनी राधा केलि-कुलीन - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (81)

    श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम की अधिष्ठात्री हैं।

  8. प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)

    सखी श्री राधा से कहती है — हे प्यारी जू! देखो, मैंने कितनी सुंदर बीरी (पान) रची है। इसका फल यह होगा कि तुम्हारे अमृत-से अधरों पर लालिमा और भी गाढ़ी हो जाएगी—अर्थात् तुम्हारे लाल होठों पर यह और गहरी रंजना कर देगी।

  9. परयो रहौं नित चरण-तल- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.5)

    हे युगल सरकार, मेरे श्री राधा माधव! मैं सदा तुम्हारे चरण-तल में पड़ी रहूँ और प्रतिदिन उनकी रज का स्पर्श करती रहूँ। चरण-दासी बनकर तुम्हारी चरण सेवा करती रहूँ, अन्य सबको भुला दूँ।

  10. ब्रजमोहन उर अवनि में राधा-सुपद-विहार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (75)

    श्री कृष्ण के हृदय रूपी धाम में श्री राधा के सुंदर चरण सदा विहार करते हैं जिससे उनका रोम रोम आनंद से भीग जाता है।

  11. अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)

    अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते।

  12. नवल लाल अरु नवल किसोरी - श्री राधा प्रसाद देव जू

    नित्य नव दूलह-दुलहिन-स्वरूप श्रीश्यामा-श्याम नव निकुंज मन्दिर में सुख-सेज पर पौढ़े हुए हैं। हे सखी, वे परस्पर हास-परिहास पूर्वक सुख विलसते हुए अतिशय शोभित हो रहे हैं।

  13. अति टोंडिकु अति चिकनियाँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (139)

    ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बिहारी) स्वरूप में उनके वैभव-ठकुराई की तो हवा भी नहीं है। यहाँ तो वे अति दीन होकर, श्री प्रिया जी (श्री राधा) के चरणों में पड़े रहते हैं एवं उनकी झूठन खाने को ही ललचाते रहते हैं।

  14. ललित बसंत सघन वृंदावन - श्री राधा प्रसाद देव जू

    वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं।

  15. प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की - श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)

    श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ ।