पायौ है नर-तन कछु आगे कौ जतन करि - ब्रज के कवित्त
हे मनुष्य! तुम्हें यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, इसलिए अपने परम कल्याण का प्रयत्न करो। संतों की संगति करके भक्ति-रस रूपी अमृत का पान करो।
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हे मनुष्य! तुम्हें यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, इसलिए अपने परम कल्याण का प्रयत्न करो। संतों की संगति करके भक्ति-रस रूपी अमृत का पान करो।
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) परम प्रेम और आनंद से परिपूर्ण हैं, साक्षात् रस का ही स्वरूप हैं। वे श्री धाम वृन्दावन में यमुना के पावन तट पर, कदम्ब के वृक्ष के नीचे विहार करते हैं, जिसकी शोभा अलौकिक, अगाध और अनिर्वचनीय है।
हे श्रीराधिका, मुझ पर कृपा कीजिए! मैं बार-बार यही विनती करता हूँ कि आपकी मधुर और परम पवित्र स्मृति सदा बनी रहे, जो मंगलमय और समस्त सुखों का सार है।
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं।
श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं।
श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम की अधिष्ठात्री हैं।
सखी श्री राधा से कहती है — हे प्यारी जू! देखो, मैंने कितनी सुंदर बीरी (पान) रची है। इसका फल यह होगा कि तुम्हारे अमृत-से अधरों पर लालिमा और भी गाढ़ी हो जाएगी—अर्थात् तुम्हारे लाल होठों पर यह और गहरी रंजना कर देगी।
हे युगल सरकार, मेरे श्री राधा माधव! मैं सदा तुम्हारे चरण-तल में पड़ी रहूँ और प्रतिदिन उनकी रज का स्पर्श करती रहूँ। चरण-दासी बनकर तुम्हारी चरण सेवा करती रहूँ, अन्य सबको भुला दूँ।
श्री कृष्ण के हृदय रूपी धाम में श्री राधा के सुंदर चरण सदा विहार करते हैं जिससे उनका रोम रोम आनंद से भीग जाता है।
श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें।
अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते।
हे हरि! आपने मुझे ऐसे अपनाया कि जहाँ-जहाँ भी आपने मेरे जीवन में बाधाएँ देखीं, वहाँ-वहाँ आपने स्वयं ही उनका निवारण किया है ।
नित्य नव दूलह-दुलहिन-स्वरूप श्रीश्यामा-श्याम नव निकुंज मन्दिर में सुख-सेज पर पौढ़े हुए हैं। हे सखी, वे परस्पर हास-परिहास पूर्वक सुख विलसते हुए अतिशय शोभित हो रहे हैं।
श्री कुंज बिहारी का यश अत्यंत मनोहर है। उनका नाम इस संसार में भक्ति का कल्पवृक्ष है, जो सदा सभी को आनंद प्रदान करता है।
ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बिहारी) स्वरूप में उनके वैभव-ठकुराई की तो हवा भी नहीं है। यहाँ तो वे अति दीन होकर, श्री प्रिया जी (श्री राधा) के चरणों में पड़े रहते हैं एवं उनकी झूठन खाने को ही ललचाते रहते हैं।
वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं।
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ ।
श्री वृन्दावन के श्वान (कुत्ते) धन्य धन्य हैं, जो यमुना घाटों और गलियों में सोते हैं और चोरों से रक्षा करते हैं।
हमारा तन, मन और सर्वस्व तो लड़ैती जू (श्री राधा) का ही है, और हमारा जीवन भी वृषभानु नंदिनी श्री राधा ही हैं।
मोक्ष आदि की लालसा ह्रदय से मिट जाये एवं समस्त भव रोगों का नाश हो जाय। हे श्यामा श्याम, मेरी यही इच्छा है कि तुम दोनों के चरणों का संयोग सदा बना रहे।