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वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी
श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।
प्यारी की सहेली निज जानिक - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)
मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]
जाके बश में रहत हौं - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
अपनी प्रभुता और ऐश्वर्य को त्यागकर मैं जिसके वश में रहता हूँ, उसी अनन्य प्रेम-भक्ति के द्वारा मनुष्य श्री वृन्दावन का परम अनुराग प्राप्त करता है।
श्री वृन्दावन सघन कुँज फूले - श्री आसकरन जी
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, और वहाँ शीतल, मंद तथा सुगंधित त्रिविध पवन धीरे-धीरे बह रही है।
प्यारी जू सहज सुहाग तिहारौ - श्री मनमोहन दास जी (शुक संप्रदाय के भक्त)
हे प्यारी जू! आपका यह सुहाग अत्यंत सहज और स्वाभाविक है। अपने प्रियतम के साथ आपका यह सुखद मिलन सदा अविचल बना रहे, यही सुख हमारे प्राणों और जीवन का एकमात्र आधार है।
विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी
मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।
बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।
मेरै सरवस धन तुमहिं - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)
हे मेरे प्राणों की वल्लभा श्री राधे! आप ही मेरा सर्वस्व और एकमात्र धन हैं। आप ही मेरी रति (प्रेम), मेरी बुद्धि, मेरी परम गति, मेरी रक्षक (स्वामिनी) और पालनकर्ती हैं।
का इन नयननितैं कबहुं निरखूँ रास विलास - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (08)
हा! क्या इन नेत्रों से मुझे कभी प्रिया-प्रियतम के श्री रास-विलास का दर्शन प्राप्त होगा? क्या कभी ऐसा समय आएगा जब मैं श्री वृन्दावन में अखंड वास करूँगा जिससे मेरे हृदय की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाएँगी?
छिन छिन परसत चरणकर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्री कृष्ण क्षण-क्षण में श्री राधा के श्री चरणों को अपने हाथों से स्पर्श कर रहे हैं, और क्षण-क्षण में उनकी बलैयां ले रहे हैं (न्योछावर हो रहे हैं)। वे बार-बार दीनतापूर्वक विनती करते हुए (हाहा खाते हुए) कह रहे हैं कि हे प्रियतमे! अब अपना यह मान त्याग दो।
नवल कुंज नवनागरी, नव नागर नंदनन्द - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
नवल निकुंजों में नवीन-नागरी (श्री राधा) और नूतन-नागर नंदनन्दन (श्री कृष्ण) विराजमान हैं। आज प्रेम का सागर अपनी मर्यादाओं को त्यागकर उमड़ पड़ा है, जहाँ ये दोनों आनंद के साथ परस्पर मिल रहे हैं।
आरति कीजै सुंदरवर की - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (39)
इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।
ढिंग विलास-गढ़ दान-गढ़ और मान-गढ़ नाम - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (23)
बरसाना के विलासगढ़, दानगढ़ और मानगढ़ नामक दिव्य लीला-स्थलों में गौरवर्णी श्री राधा की प्रेम-घटा निरंतर उमड़ती रहती है, जहाँ श्री कृष्ण, चातक के समान, उस प्रेम-रस का निरंतर पान करते रहते हैं।
श्याम सदा वश प्रीतिके तीन भुवन विख्यात - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्यामसुन्दर सदा केवल प्रेम के ही अधीन रहते हैं—यह सत्य तीनों लोकों में सुविख्यात है। सच्चे प्रेम के बिना नन्दमहाराज के पुत्र श्रीकृष्ण की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है।
प्रेम भरे छविसों भरे भरे अनन्द हुलास - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
प्रेम और सौंदर्य से परिपूर्ण, हृदय में आनन्द और उल्लास लिए, युगल माधुरी के रस से ओत-प्रोत दिव्य दंपति (श्री राधा-कृष्ण) ब्रज में मधुर विहार करते हैं।
कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)
कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है ।
अति अद्भुत लावण्य निधि श्री वृन्दावन चन्द - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्री वृंदावन धाम सौंदर्य और माधुर्य की अद्भुत निधि है, जिसका वर्णन करने में वेद भी असमर्थ हैं, जहाँ रसिक नवल श्यामसुंदर नित्य विहार करते हैं।
कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)
कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।
वृन्दावन निज धाम में, इक रस युगल विलास - श्री बेगमदास (शुक संप्रदाय के रसिक भक्त)
वृन्दावन, जो स्वयं प्रिया-प्रियतम का निजमहल है, वहाँ केवल युगल के प्रेम-विलास का रस ही सतत बरसता है। बेगमदास कहते हैं कि सखीभाव के बिना किसी को भी उस रस में प्रवेश नहीं है।
जाकी कृपा सों नित्य दिव्य ब्रजमंडल माँहि - श्री गिरिराज गोस्वामी 'अनन्त' (गोकुल)
जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।