सुविचार

रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।

3464 छंद उपलब्ध हैं

  1. बेननि के नैननि सों दरस्यो - श्री वल्लभ रसिक जी, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (54)

    रसिक वाणी रूपी नेत्रों के माध्यम से मैंने श्रीयुगल सरकार के दिव्य स्वरूप का साक्षात् दर्शन किया है, और अब अपने नेत्रों की मूक भाषा व प्रेमाश्रुओं द्वारा उनके उस अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन किया है।

  2. कहा कहौं शोभा सुभग कहत - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    श्री युगल सरकार की उस परम सुंदर और मंगलमयी शोभा का मैं क्या वर्णन करूँ, उसके विषय में कुछ भी कहते नहीं बनता है। दोनों एक ही समान किशोर अवस्था के हैं, जो अद्भुत सौंदर्य की कांति से परिपूर्ण हैं और उनके श्रीअंग अत्यंत सुंदर तथा सुकोमल हैं।

  3. जा रज ही के लोभ सौं वत्स रूप गहि स्याम- श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    जिस श्रीवृंदावन रज के परम लोभ के कारण ही श्यामसुंदर श्रीकृष्ण ने बछड़े का रूप धारण किया और दिन-रात अपनी जिह्वा से उस रज का आस्वादन करते हुए वन-वन में विचरते रहे।

  4. ‘नारायण’ नवखण्ड में निरभय जिनको - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (20)

    श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि इस सम्पूर्ण पृथ्वी के नौ खण्डों में जिनका सर्वथा भयरहित होकर शासन था, ऐसे जगत्प्रसिद्ध महान राजाओं को भी अंततः बलवान काल ने अपना ग्रास बना लिया।

  5. तू न काहु कौ होइगौ - श्री अनन्य अली जी की वाणी, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.66)

    इस संसार में न तो तू कभी किसी का हो सकेगा और न ही कोई वास्तव में तेरा अपना है। इसलिए सब कुछ त्यागकर तू केवल श्री वृंदावन धाम में वास कर, जहाँ श्री राधा कृष्ण हर प्रकार से तेरी बाँह थामकर तुझे अपनी शरण में रखेंगे।

  6. रंग सरोवर श्री बिपुन प्रिया-लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (38)

    श्रीवृंदावन रूपी रंग-सरोवर में श्रीप्रिया और लाल जी दोनों सुंदर हंसों के समान क्रीड़ा कर रहे हैं। रसिक रूपी कमलों के मुकुटमणि ये दोनों युगल परस्पर एक-दूसरे के अधर-सुधा के अत्यंत मधुर रस का आचमन कर रहे हैं।

  7. जगाद राधा प्रियसंगमेऽपि न मे - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.34)

    कुरुक्षेत्र में श्रीराधा अपनी एक सखी से कहती हैं कि हे सखी! प्रियतम (श्री कृष्ण) के इस मिलन में भी मुझे यहाँ तनिक भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा है। आश्चर्य है कि मेरे मन में तो केवल वेणु की मधुर ध्वनि से गुंजायमान श्री धाम वृन्दावन के यमुना तट में ही जाने की ही तीव्र लालसा हो रही है।

  8. मो मन अटक्यौ श्याम सों - ब्रज के दोहे

    मेरा मन श्रीश्यामसुन्दर के अनुपम सौन्दर्य में ऐसा अटक गया है कि अब वहाँ से निकल ही नहीं सकता। उसकी दशा उस दुबली-पतली गाय के समान हो गई है, जो किसी सँकरे स्थान में घुस जाने पर चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाती।

  9. अरपी श्री हरि चरन जुग - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (52)

    श्री रसखान कहते हैं कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्री कृष्ण के युगल चरण रूपी दिव्य पुष्प के पराग की अनुपम शोभा को निहारकर उन्हीं के चरणों में समर्पित की है। मेरी ऐसी आशा है कि अपार भौंरों के समूह रूपी रसिक जन इसमें विचरण करेंगे अर्थात इससे रस ग्रहण कर आनंदित होंगे।

  10. कबहूँ गहवर बन विचर कबहुँ - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (82)

    कभी बरसाना के गहवर वन में और कभी श्री धाम वृंदावन में विचरण करते हुए, परम सुंदर और आनंददायक गौर वर्ण की श्री राधा और श्याम वर्ण के श्री कृष्ण की अत्यंत मनमोहक युगल छवि का निरंतर अवलोकन करता रहूँ।

  11. पतिवृता वृत जानिये वट बंशीबट - श्री चरणदास

    भक्त को पतिव्रता स्त्री के समान अनन्य निष्ठा का व्रत धारण करना चाहिए, समस्त वट वृक्षों में केवल श्री वंशीवट को ही प्रधान जानना चाहिए और गोपेश्वर महादेव को अपना परम उपकारी मानना चाहिए, क्योंकि उनके समान हितकारी दूसरा कोई नहीं है।

  12. दियौ किसोरी लाड़ली श्रीवृंदावन - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, पक्षी बंध सवैया (6)

    हे सुख की सागर, श्री लाड़िली किशोरी जी (श्री राधा)! जैसे आपने अपनी अगाध कृपा करके मुझे श्री धाम वृन्दावन में वास प्रदान किया है, वैसे ही समस्त ब्रजवासी जन भी मुझ पर अपनी सहज कृपा-दृष्टि बनाए रखें एवं मेरा किसी ब्रजवासी के प्रति स्वप्न में भी अपराध न बने।

  13. साकत बाँभन जिन मिलौ वैष्णव - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)

    प्रभु-विमुख (विषयी) ब्राह्मण का संग कदापि नहीं करना चाहिए, उसकी अपेक्षा हरि-भक्त (वैष्णव) चंडाल का संग भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जिसके मिलने से हृदय में परम सुख और आनंद प्राप्त हो, मानो स्वयं श्री गोपाल ही मिल गए हों।

  14. द्वै द्वै बाँह सिलह सजैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (643)

    जैसे जगत में साधारनतया दोनों हाथों में ही हथियार को सजाया जाता है, वैसे ही साधक समाज नाना प्रकार के साधन-बल का भरोसा अपने मन में रखते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मेरे तो एक ही हाथ स्वरूप नित्यबिहार का ही अनन्य भाव से भजन, नित्य-विहार की ही लालसा सदा-सर्वदा बनी है।

  15. किरीटकेयूरधरे नूपुराभातपादुके - सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (5)

    हे मुकुट और केयूर धारण करने वाली! जिनके चरण नूपुरों की शोभा से सुशोभित हैं, तथा जो अनेक दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर कृपा कीजिए।

  16. ब्रज बीथिन्ह जब सांवरो चलै - ब्रज के दोहे

    जब साँवले श्रीकृष्ण ब्रज की गलियों में मदमस्त हाथी की भाँति अत्यंत सुंदर-मतवारी चाल से चलते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके संग-संग प्रतिपल अद्भुत सौंदर्य की वर्षा हो रही हो।

  17. श्री राधा बृजराज को नित - श्री मलूक दास जी की वाणी, श्रीराधाकृष्ण व्याहुला (2)

    हमें प्रतिदिन निरंतर श्री राधा जी और ब्रजराज श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से यह वर्णन किया है कि उनके संत ही उनका वास्तविक स्वरूप हैं।

  18. ओर मिले वन ना मिले - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)

    जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।

  19. ऐसौ अद्भुत प्रेम है दम्पति - श्री सरस माधुरी

    दिव्य दम्पति के अंगों में परस्पर ऐसा अद्भुत और विलक्षण प्रेम व्याप्त है कि वे नित्य निरंतर सर्वदा एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं, फिर भी उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती है।