यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी
यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।
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यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।
यह ब्रजभूमि अत्यंत धन्य है और यहाँ का बरसाना गाँव भी परम धन्य है। वह गोप-कुल भी परम धन्य है, जिसका धाम नित्य मंगलमय और रस बरसाने वाला है।
श्रीराधा और श्रीकृष्ण रूपी दो अनमोल रत्न भक्तों के नेत्रों में बसे हुए हैं। इनमें से एक हीरे के समान उज्ज्वल है और दूसरा लाल मणि के समान अनुपम है। सच्चे जौहरी के समान रसिक भक्त ही इन दोनों दिव्य रत्नों के सौन्दर्य और प्रेममयी महिमा को पहचानकर उनका आस्वादन करते हैं।
जिस प्रकार श्रीउद्धवजी के आगमन पर श्रीवृन्दावन अथवा गोकुल में महान उत्सव और आनंद प्रकट हुआ था, उसी प्रकार का दिव्य हर्ष और उत्सव मेरे हृदय में भी क्या कभी प्रकट होगा?
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।
समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।
स्वामी श्री हरिदास जी, श्री विट्ठल विपुल जी, श्री विनोद जी, दासी श्री बिहारिनिदास जी तथा श्री व्यास जी की पावन रज प्राप्त करके परम आनंद पाया है। इन महान रसिक आचार्यों के चरणों की रज का आश्रय ही समस्त दिव्य सुख और उल्लास को प्रदान करने वाला है।
बकरी का बच्चा 'मैं-मैं' (अहंकार) की पुकार करते हुए अपने प्राण गंवा देता है, जबकि उससे कहीं भली मैना है जो प्रभु का नाम लेकर आनंद से मलीदा खाती है। भाव यह है कि 'मैं-मैं' अर्थात् अहंकार जीव का विनाश कर देता है, जबकि प्रभु का नाम सुमिरन करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है।
श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।
अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।
श्री राधिका की कृपा के लवलेश मात्र से देवता आनन्दित हो-होकर हँसते और नृत्य करते हैं और उनकी भृकुटी के नेक ही वक्र होने पर थर-थर काँपते हैं। अतः हम श्रुतियाँ भी सकल दोष-परिहार के लिए भूर्भुवः स्वः आदि व्याहृतियों के साथ स्तवन करती हुई उन्हें सदा अनुकूल करने के लिए वन्दना करती हैं।
हाथों में लाठी और मुरली धारण किए हुए तथा सिर पर घुँघराले बालों से सुशोभित, श्यामसुंदर का यह अत्यंत सुंदर और मनमोहक स्वरूप मेरे हृदय में सदैव बसा रहे।
वेद, पुराण, आगम और स्मृतियाँ, इन सभी का परम सार प्रेम ही है। प्रेम के बिना हृदय में दिव्य प्रेम का बीज अंकुरित नहीं होता, अर्थात् दिव्य प्रेम की प्राप्ति अंततः प्रेम के द्वारा ही होती है।
जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।
सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।
श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।
चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मिलकर मेरी हँसी उड़ाएँ, मैं किसी की बात का तनिक भी बुरा नहीं मानूँगा। श्रीराधा के प्राणप्रिय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अब जीवन में जो भी होनी हो, वह भले ही हो जाए।
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जैसे खेत में खड़ा बिजूका (पुतला) देखने में भय उत्पन्न करता है, पर वास्तव में वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वैसे ही संसार के भय और बाधाएँ भी केवल भयभीत करती हैं। जो साधक प्रभु पर भरोसा रखकर, सब प्रकार की भय-बाधायों से निःशंक होकर आगे बढ़ता है, वह भक्ति और प्रेम-रस की अपार संपदा प्राप्त करता है।
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।