सुविचार

रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।

3420 छंद उपलब्ध हैं

  1. ‘रा’ अक्षर को सुनत ही - ब्रज के दोहे

    'रा' अक्षर को सुनते ही मेरा मन उसके प्रति अत्यंत लालायित हो उठता है। यह विनीत सखी उस पावन अक्षर पर अपने मन, कर्म, वचन, प्राण और सर्वस्व धन को न्यौछावर करती है।

  2. धन्य धन्य श्री गिरिराज जु - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (81)

    श्री गिरिराज जी धन्य हैं, धन्य हैं। वे भगवान श्रीहरि के समस्त भक्तों में श्रेष्ठ और अग्रणी हैं। वे निरन्तर श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहकर उनकी सेवा करते हैं, और इसीलिए वे बलभद्र और श्यामसुंदर के मन को अत्यंत प्रिय लगते हैं अथवा श्री गिरिराज जी मनमोहन के मन को मोहने का सामर्थ रखते हैं।

  3. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  4. हरि कृपा जो होय तो - श्री सहजो बाई

    यदि श्री हरि कृपा करें तो बहुत अच्छी बात है, और यदि वे न भी करें, तो भी कोई बात नहीं, परंतु यदि जीवन में गुरुदेव की कृपा एवं दया प्राप्त न हो, तो मनुष्य की बुद्धि सदा अंधकारमय ही बनी रहती है और वास्तविक विवेक कभी जागृत नहीं हो सकता।

  5. अतन होय वन पायबौ गायौ - श्री किशोरी अलि

    अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।

  6. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  7. हित मूरति हित प्रेम निधि - श्री हित परमानंद दास जी, श्रीराधा रस सहस्रनाम

    श्री राधा साक्षात् प्रेम की मूर्ति हैं, वे प्रेम की निधि हैं, तथा प्रेम का मूल आधार हैं। श्रीराधा सर्वथा केवल प्रेम से ही भरी हुई हैं, उनका रोम-रोम प्रेम-रस से परिपूर्ण है।

  8. झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

    सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।

  9. जायौ भौंड़ी भेड़ कौ कीनौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

    यदि कोई भेड़ का बच्चा (भोली भेड़) सिंह बनना चाहे, तो केवल इच्छा करने से वह सिंह नहीं बन सकता। सिंह तो वही बन सकता है जिसने अपने चारों ओर की सभी बाड़ें (बंधन और सीमाएँ) तोड़ दी हों। जो अनेक धर्मों-कर्मों, विधि-निषेधों, सांप्रदायिक विकृतियों अथवा बन्धनों में फँसा हुआ हो, वह सिंह के समान दृढ़ व्रत रखने वाले अनन्य रसिकों की भला क्या समानता करेगा। वास्तविक रसिक तो वही होता है जिसने समस्त बन्धनों को तोड़कर केवल एकमात्र प्रिया-प्रियतम से ही अनन्य सम्बन्ध जोड़ लिया हो।

  10. ध्याने ध्यानेन राधाया व्यायन्ते - ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.124.97 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 124 / छंद 97)

    जो साधक निरन्तर श्रीराधा के ध्यान में तल्लीन रहते हैं और अपने मन को उन्हीं के ध्यान में लगाते हैं, वे इसी जीवन में जीवन्मुक्त हो जाते हैं। शरीर त्यागने के पश्चात् वे श्रीकृष्ण के पार्षद (नित्य दिव्य सेवक) बनते हैं।

  11. हरि कौ सुमिरौ हर घरी - श्री रसनिधि

    हे परम चतुर और सज्जन पुरुषों! जीवन की प्रत्येक घड़ी में श्री हरि का ही स्मरण करो और अपनी जिह्वा से सदैव 'हरि हरि' बोलो। प्रत्येक प्रकार से श्री हरि के ही बनकर रखो। इसी में ही जीवन की परम सार्थकता है।

  12. कब रसिकनिके पैर परि रोऊँ - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (04)

    वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?

  13. देह धरेका फल यही भज मन कृष्ण मुरार - श्री कबीरदास

    हे मन! इस मानव देह को धारण करने का वास्तविक फल केवल यही है कि तू निरंतर श्रीकृष्ण मुरारि का भजन कर। मनुष्य-जन्म का वास्तविक आनंद भगवद्भजन में ही है, क्योंकि यह दुर्लभ अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होता।

  14. बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।

  15. भ्रंसिन्या - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (49)

    अरे मन! श्री कृष्ण के चरण कमलों के प्रेमधन को नष्ट कर देने वाली स्त्रियों के परिहासमय स्नेह वचनों में फँस कर प्रेमधन से वञ्चित मत हो। पुत्र-मित्र-वैभवों को नश्वर जान कर उनकी आकांक्षा मत करो। निरन्तर राधादास्य प्रदानकारी वृषभानुनन्दिनी सरसी अर्थात् श्री राधाकुण्ड का ध्यान करो।

  16. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  17. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  18. जो मन मोहन करत बस - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.3)

    जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।

  19. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।