मेरी बरसाने वारी प्यारी प्यारी प्यारी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 2 (43)
मेरी बरसानेवारी श्री राधारानी अत्यंत प्यारी हैं, जो वृषभानु दुलारी हैं, ब्रज रस प्रदान करने वाली हैं।
ब्रज रस माधुरी जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की काव्य रचना है जो ब्रज रस की माधुरी को प्रकट करती है । रचना में विभिन्न दोहे हैं। इसे तीन भागों में बांटा गया है। लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज
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मेरी बरसानेवारी श्री राधारानी अत्यंत प्यारी हैं, जो वृषभानु दुलारी हैं, ब्रज रस प्रदान करने वाली हैं।
बरसाने वाली श्री राधा की जय, सुखघन नंदनंदन बनवारी की जय। जब श्री कृष्ण को महारास करने की इच्छा हुई, तब उन्होंने अपना मुकुट उतार कर श्री राधा के चरणों में रखकर रास की याचना की, क्यूंकि महारास की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा ही हैं।
मेरी राधारानी ब्रज रस की खान हैं। वह परम ठाकुर जी [श्री कृष्ण] की भी ठकुरानी हैं।
मेरी राधेरानी प्रेम रूप रस खानी, जाकी करे पूर्ण ब्रह्म श्याम अगवानी। मेरी ऐसी राधेरानी ब्रजरसखानी, जाके पाछे पाछे डोलें सारँगपानी ।।
जय राधे जय कृष्ण जय वृंदावन, रसिक मुकुट मणि जय गोपीजन । राधे राधे रटें श्याम, राधे रटे श्याम श्याम, राधे श्याम युगल नाम, मेरो है जीवन ।।
प्रेम रूप रस खानी, ऐसी राधेरानी। वृंदावन महारानी, ऐसी राधेरानी।
हे राधे! आप ही केवल कृपालु हैं, कृपया मुझ पर कृपा कीजिए।
वृषभानु दुलारी श्री प्रिया जू, जो भोरी हैं, प्यारी हैं, बरसाने वाली हैं, उनकी जय हो, जय हो, जय हो। श्री प्यारी जू आगे-आगे चल रहीं हैं, पीछे सखियाँ चल रहीं हैं और सखियों के पीछे ब्रजेंद्र नन्दन श्री कृष्ण चल रहे हैं।
जय नंदनंदन सुख धाम हरे, गोपी जन वल्लभ श्याम हरे। जय जीवन धन ब्रज बाम हरे, संग मनसुख अरु श्रीदाम हरे।
O Radhe! Bestow Your grace upon me now. O Radhe! I have taken eventual refuge at Your Door. O Radhe! I am burning in the fire of three fold material suffering.
मन करू सुमिरन राधा रानी के चरन । राधा रानी के चरन, नव पल्लव बरन । राधा रानी के चरन, जीवन रसिकन ।
श्री राधा ही मेरे जीवन की अंतिम गति है। मेरा प्रेम केवल श्री राधा रानी के चरण कमलों तक ही सीमित है।श्री राधा ही मेरे जीवन की अंतिम गति है, और मैं उन पर करोड़ों करोड़ों कामदेवों को न्योछावर करता हूं।
श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "रसिकों की कृपा से उन्हें यह ज्ञात हुआ की श्री कृष्ण नित्य ही श्री राधा की शरण में रहते हैं एवं जब श्रीराधा अपनी भौहें तान लेती हैं तब श्री हरि भी डरते हैं । हे राधारानी आप हमारी भी सुध लो, श्री किशोरी जी जैसा कृपालु कहीं कोई नहीं है।"
श्री कृपालु जी महाराज का कहना है कि श्री राधा का नाम, रूप और गुण मेरे जीवन की संपदा हैं।
तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना कि मैं तो उठाने के क़ाबिल नहीं हूँ। मैं आ तो गया हूँ ,मगर जानता हूँ कि तेरे दर पे आने के क़ाबिल नहीं हूँ।। जमाने की चाहत में खुद को भुलाया, तेरा नाम हरगिज़ जुबां पर न लाया। ख़तावार हूँ मैं, गुनाहगार हूँ मैं, तुम्हें मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।
श्री कृष्ण अत्यंत प्यारे हैं और श्री राधारानी उनसे भी अधिक प्यारी हैं।
हे श्री राधे, केवल आपकी कृपा से ही कोई भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है एवं आपकी अहैतुकी कृपा से ही कोई जीव आपकी शरण ग्रहण कर पाता है।
ओ "राधे", श्री कृष्ण बहुत प्यारे है , फिर भी आप उनसे ज्यादा प्यारी हैं।
ओ "राधे", मैं भौतिक संतुष्टि, मुक्ति, यहाँ तक कि वैकुंठ धाम भी नहीं मांगता हूँ आपसे । मेरी एकमात्र इच्छा ब्रज रस की बूंद पीना है।
हे राधे, कृपया मेरे बारे में भी आप विचार करें और मेरी अनंत जन्मों की बिगड़ी बना कर प्रेम दान करें, क्योंकि पूरे ब्रह्मांड में कोई भी आपके जैसा कृपालु नहीं है, आप ही ठकुरानी हैं आप ही महारानी हैं।