ब्रज रस माधुरी

ब्रज रस माधुरी जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की काव्य रचना है जो ब्रज रस की माधुरी को प्रकट करती है । रचना में विभिन्न दोहे हैं। इसे तीन भागों में बांटा गया है। लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

131 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री राधे बरसाने वारी, नँदनंदन सुखघन बनवारी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (85)

    बरसाने वाली श्री राधा की जय, सुखघन नंदनंदन बनवारी की जय। जब श्री कृष्ण को महारास करने की इच्छा हुई, तब उन्होंने अपना मुकुट उतार कर श्री राधा के चरणों में रखकर रास की याचना की, क्यूंकि महारास की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा ही हैं।

  2. मेरी राधेरानी प्रेम रूप रस खानी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (106)

    मेरी राधेरानी प्रेम रूप रस खानी, जाकी करे पूर्ण ब्रह्म श्याम अगवानी। मेरी ऐसी राधेरानी ब्रजरसखानी, जाके पाछे पाछे डोलें सारँगपानी ।।

  3. जय राधे जय कृष्ण जय वृंदावन - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी (1.91)

    जय राधे जय कृष्ण जय वृंदावन, रसिक मुकुट मणि जय गोपीजन । राधे राधे रटें श्याम, राधे रटे श्याम श्याम, राधे श्याम युगल नाम, मेरो है जीवन ।।

  4. प्यारी प्यारी भोरी भारी भानुदुलारी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (8)

    वृषभानु दुलारी श्री प्रिया जू, जो भोरी हैं, प्यारी हैं, बरसाने वाली हैं, उनकी जय हो, जय हो, जय हो। श्री प्यारी जू आगे-आगे चल रहीं हैं, पीछे सखियाँ चल रहीं हैं और सखियों के पीछे ब्रजेंद्र नन्दन श्री कृष्ण चल रहे हैं।

  5. राधा मेरी गति मति - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (75)

    श्री राधा ही मेरे जीवन की अंतिम गति है। मेरा प्रेम केवल श्री राधा रानी के चरण कमलों तक ही सीमित है।श्री राधा ही मेरे जीवन की अंतिम गति है, और मैं उन पर करोड़ों करोड़ों कामदेवों को न्योछावर करता हूं।

  6. डरावे हरिहूँ को भौंह तानी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी-1 (82)

    श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "रसिकों की कृपा से उन्हें यह ज्ञात हुआ की श्री कृष्ण नित्य ही श्री राधा की शरण में रहते हैं एवं जब श्रीराधा अपनी भौहें तान लेती हैं तब श्री हरि भी डरते हैं । हे राधारानी आप हमारी भी सुध लो, श्री किशोरी जी जैसा कृपालु कहीं कोई नहीं है।"

  7. तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना कि मैं तो उठाने के क़ाबिल नहीं हूँ - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

    तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना कि मैं तो उठाने के क़ाबिल नहीं हूँ। मैं आ तो गया हूँ ,मगर जानता हूँ कि तेरे दर पे आने के क़ाबिल नहीं हूँ।। जमाने की चाहत में खुद को भुलाया, तेरा नाम हरगिज़ जुबां पर न लाया। ख़तावार हूँ मैं, गुनाहगार हूँ मैं, तुम्हें मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।

  8. तेरी कृपा ही ते कोऊ - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 2 (49)

    हे श्री राधे, केवल आपकी कृपा से ही कोई भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है एवं आपकी अहैतुकी कृपा से ही कोई जीव आपकी शरण ग्रहण कर पाता है।

  9. भक्ति मुक्ति बीकुनथा नाहिन मांगू राधे - ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

    ओ "राधे", मैं भौतिक संतुष्टि, मुक्ति, यहाँ तक कि वैकुंठ धाम भी नहीं मांगता हूँ आपसे । मेरी एकमात्र इच्छा ब्रज रस की बूंद पीना है।

  10. हमरिहुँ सुधि लो राधे - ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

    हे राधे, कृपया मेरे बारे में भी आप विचार करें और मेरी अनंत जन्मों की बिगड़ी बना कर प्रेम दान करें, क्योंकि पूरे ब्रह्मांड में कोई भी आपके जैसा कृपालु नहीं है, आप ही ठकुरानी हैं आप ही महारानी हैं।