आनँद भवन वृषभान कै - श्री चतुर्भुज दास
राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है।
श्री चतुर्भुज दास पुष्टिमार्ग या वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे।
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राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है।
श्री कृष्ण के गुणों का वर्णन करते हुए श्री चतुर्भुज दास कहते हैं कि वे सदैव वात्सल्य और करुणा से परिपूर्ण रहते हैं तथा अपने शरणागत को निर्भयता प्रदान करते हैं। वे पापों का नाश करने वाले, दीनों के सच्चे मित्र तथा सुख के अथाह सागर हैं। वे समस्त सुखों के दाता हैं और दुःखों का निवारण करने वाले हैं।
हे सखी! आज तो तुझे बस यही एक रट लग गई है। तू वृन्दावन के सीधे-टेढ़े और दुर्गम वीथियों में भटकती हुई 'गोविन्द ले लो, कोई गोविन्द ले लो!' यही पुकारती फिर रही है।
नंदलाल श्रीकृष्ण झूला झूल रहे हैं, और संग में वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी अनुपम छवि से मोहक शोभा बिखेर रही हैं। वन में चारों ओर रिमझिम वर्षा की बूँदें गिर रही हैं।
युगल किशोरी-किशोर नवयौवन से युक्त, अनुपम सौंदर्य की दिव्य मूर्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण, जो स्वयं कामदेव को मोहित करने वाले हैं, सौंदर्य के सागर हैं; और श्रीराधा, रूप-लावण्य की साक्षात मूर्ति हैं।
सारंग जैसे नेत्रों वाली मृगनयनी श्री राधा, मधुर राग सारंग गा रही हैं। अत्यंत मनमोहक साड़ी धारण कर, वे मधुर-मधुर सुर से वीणा वादन कर रही हैं ।
हे सखी, सौंदर्य की पराकाष्ठा (श्री कृष्ण) को निहारो! प्रत्येक अंग से अमित माधुरी छलक रही है जिसको निहार कर साक्षात कामदेव भी लज्जित हो रहा है ।
जब श्री राधिका ने श्री कृष्ण की मुरली सुनी तो अपने भवन से समस्त काज को त्याग कर वे वन की ओर चल पड़ी।
ब्रज के रमणीय क्षेत्र में, श्री गिरिराजी के पावन धाम में घोष सीमंतिनी श्री राधा के साथ श्री कृष्ण निरंतर केली करते हैं जिसका दर्शन कर कामदेव भी लज्जित हो जाता है ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों सहित समस्त सुख प्रदान करने वाले श्री गोवर्धनधर प्रभु श्रीकृष्ण ही गोकुल के त्राता और भक्तों के रक्षक हैं; अतः उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए।
हे सखी, आज श्री कृष्ण झूला झूल रहे हैं। उनकी बायीं ओर वृषभानुनंदिनी राधिका लाल रंग की साड़ी पहिने सुशोभित हैं ।
जिस श्री कृष्ण के विहार का गान करने में वेद भी असमर्थ हैं, जिसकी लीला नित्य है, जो क्षण-क्षण नवीन लगती है, उसके गुणों का एक रसना से वर्णन करना मेरे लिए असंभव है।
आज कुंज महल में दादुर, मोर, पपीहा मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं एवं कोयल मधुर शब्दों से किलकारी कर रही है।
प्यारी श्री राधा जब गाती हैं, तब कोयल अपना मुख बंद कर लेती है, और जब श्री कृष्ण गाते हैं, तब पक्षीगण अपने नेत्र बंद कर लेते हैं।
राजा वृषभानु की पुत्री श्री राधा को निहारो जिनकी नैंन मृग के समान मोहक हैं, जिनका अद्बुत रूप सौंदर्य है एवं जिनका अंग अंग सुंदरता की खान है ।
श्याम सुंदर से कभी नेह मत करना क्यूँकि उनका मन और शरीर दोनों ही काले हैं। वह मन मोहक एवं सलोने हैं, यदि आपने उनसे प्रीति की तो वह तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे ।
श्री चतुर्भुजदास जी का जन्म 1597 में ब्रज के जमुनावता ग्राम में हुआ था। इनके पिता अष्टछाप के महान कवी श्री कुम्भनदास जी थे।
हे गोवर्धन वासी साँवरे लाल, आपके बिना रहा नहीं जाता। हे नन्द के दुलारे लाड़ले, आपके बिना अब रहा नहीं जाता।
प्रातः समय में ललिता एवं अन्य सखियाँ निकुंज द्वार में वीना बजा रही हैं । चतुर एवं नवीन दम्पति राधा कृष्ण अपनी शैया पर विराजमान हैं एवं वीना का आनंद ले रहे हैं ।