लाल बलवीर

श्री लाल बलबीर निम्बार्क संप्रदाय के वृंदावन धाम के रसिक कवि हैं।

114 लेख उपलब्ध हैं

  1. चरन हैं नीके हित ही - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    श्री राधारानी के चरण अत्यंत सुंदर, हितकारी और भक्तों के मन को प्रिय लगने वाले हैं, जो सभी संकटों का हरण करने वाले तथा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।

  2. दियौ किसोरी लाड़ली श्रीवृंदावन - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, पक्षी बंध सवैया (6)

    हे सुख की सागर, श्री लाड़िली किशोरी जी (श्री राधा)! जैसे आपने अपनी अगाध कृपा करके मुझे श्री धाम वृन्दावन में वास प्रदान किया है, वैसे ही समस्त ब्रजवासी जन भी मुझ पर अपनी सहज कृपा-दृष्टि बनाए रखें एवं मेरा किसी ब्रजवासी के प्रति स्वप्न में भी अपराध न बने।

  3. जै जै कीरति लाड़ली जै नँदनँदन अधार - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    कीर्ति कुमारी श्री लाडिली जी (श्री राधा) की बारम्बार जय-जयकार हो, जो नंदलाल (श्री कृष्ण) के जीवन का एकमात्र आधार हैं। उन परम रस की पुंज, स्वामिनी जी की सर्वदा जय हो, जो अपने दासों के हृदय का सार तथा उनकी परम आशा हैं।

  4. कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

    श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।

  5. आये फाग खेलन गोपाल बरसाने में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक

    श्री गोपाल बरसाने में फाग (होली) खेलने के लिए पधारे हैं। चारों ओर लोग फागुन के गीत गा रहे हैं, हाथ से ताल दे रहे हैं, और सबका हृदय आनंद से झूम रहा है।

  6. स्यामा सुकुमारी प्राणप्यारी श्रीविहारीजी की - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    श्रीराधा परम सुकुमारी हैं, श्रीविहारी (कृष्ण) की प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं। वे परम सुंदर, सब की शिरोमणि स्वामिनी हैं।

  7. मेरे श्रीराधारमन अति सरूप सुकमार - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, दोहा (2)

    मेरे श्री राधारमण अत्यंत सुंदर और सुकुमार अवस्था वाले हैं। उनके सौंदर्य की छवि ऐसी अनुपम है कि उस पर मैं कोटि-कोटि कामदेव और रति को भी बार-बार न्यौछावर कर दूँ।

  8. जाके पद नेति नेति बंदत सुरेस सेस - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (60)

    जिनके चरणों की स्तुति इन्द्र और शेष भी “नेति-नेति” कहकर करते हैं, वे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर खड़े हैं।

  9. प्यारी जू तिहारे पद पंकज की बलिहारी - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, विप्रलब्धा (9)

    हे श्री राधाजू! मैं आपके चरण कमलों पर बार बार बलिहारी जाती हूँ। श्रीकृष्ण सदा आपके चरणों के ही चिंतन में रमे रहते हैं, उनके हृदय से आपके श्री चरण एक क्षण के लिए भी नहीं निकलते ।

  10. जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (105)

    न मैंने योग-साधना की, न यज्ञ किए, न जप, न तपस्या, और न ही तीर्थों की यात्रा की। यहाँ तक कि मैंने भगवान श्री हरि की कथाएँ भी नहीं सुनीं।

  11. जय जय श्रीराधारमन जय जय श्रीसुखरास - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, बसन्त ऋतु (1)

    सुख की राशि, श्री राधारमण लाल जी की जय हो! रसिकों के प्राण, जीवन धन की जय हो! हे राधारमण लाल, कृपा कर मेरे हृदय में भी सदा निवास करें।

  12. फूले हैं पलास आस पास बन बागन में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, बसन्त ऋतु (26)

    चारों ओर पलाश के फूल खिल उठे हैं, जिनकी मनोहर छटा ने वनों और उपवनों को रंगों से भर दिया है। कोयल अपनी मधुर वाणी में कूकने लगी है, मानो प्रेम का संदेश सुना रही हो।

  13. कीरति कें कन्या भई - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)

    महारानी कीरति को एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ है, जिनके दर्शन के लिए व्रज के समस्त गोप-गोपीजन उमड़े हुए हैं। सभी हर्ष में नाच रहे हैं, कूद रहे हैं, मंगल गीत गा रहे हैं, और दही-माखन आदि लुटा रहे हैं।

  14. यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (21)

    श्री धाम वृंदावन में यमुना किनारे वृक्ष एवं लताएँ झूल रही हैं। फूलों से रस टपक रहा है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है।

  15. अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

    हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं।